विश्व आदिवासी दिवस: क्या आदिवासियों को मिल रहे हैं वो अधिकार, जिनके हैं वे हक़दार
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विश्व आदिवासी दिवस: क्या आदिवासियों को मिल रहे हैं वो अधिकार, जिनके हैं वे हक़दार

By Newstrack calender  09-Aug-2019

विश्व आदिवासी दिवस: क्या आदिवासियों को मिल रहे हैं वो अधिकार, जिनके हैं वे हक़दार

आज जब हम हर्षोल्लास के साथ विश्व आदिवासी दिवस मना रहे हैं, तब हमारी नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि हम आदिवासी-मूलवासी लोगों की दशा और दिशा का ईमानदारी से आंकलन करें। हम यह देखें कि जो संवैधानिक अधिकार भारतीय संविधान ने हमें प्रदान किया है, इसे अपने समाज-राज्य और देश-हित में इस्तेमाल कर पा रहे हैं या नहीं। फिर चाहे वो जल-जंगल-जमीन पर परंपरागत अधिकार हो, पांचवीं अनुसूची में उल्लेखित प्रावधान हो, ग्रामसभा का अधिकार हो, सीएनटी, एसपीटी एक्ट के प्रावधान हों, वन अधिकार कानून हो या फिर स्थानीय नीति के प्रावधान हों, हम यह देखें कि धर्मांतरण बिल के प्रावधान व जमीन अधिग्रहण बिल 2017 के प्रावधानों ने हमें क्या लाभ पहुंचाया है?
समाज ने घट रही घटनाओं पर हमें चिंतन करने की आवश्यकता है। फिर चाहे वो अंधविश्वास के कारण हो रही हत्याएं हों या उग्रवादी-माओवादी हिंसा के नाम प्रति वर्ष सैकड़ों लोगों की हत्याएं, अपहरण, बलात्कार, मानव तस्करी जैसे अमानवीय घटनाएं हों। इनसे आदिवासी-मूलवासी समाज को ही क्षति पहुंच रही है। परिणामस्वरूप समाज की समरसता, एकता विखंडित होने से जल-जंगल-जमीन लूटनेवालों की ताकत बढ़ती जा रही है। आदिवासी-मूलवासी किसान, दलित-मेहनतकश समाज की सामाजिक, वित्तीय, संस्कृतिक और राजनीतिक संगठित शक्ति शनैः शनैः कमजोर पड़ती जा रही है। आज जनविरोधी नीतियों की आलोचना करने पर देशद्रोह के मामले का सामना करना होगा। 
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पथलगड़ी के नाम पर सैकड़ों मुंडा आदिवासियों पर देशद्रोह का मामला दर्ज किया गया है। हजारों निर्दोष आदिवासी युवक जेल में हैं। जल-जंगल-जमीन की लूट जोरों शोरों से जारी है, जिससे हमारी पहचान और संस्कृति पर भी हमला बढ़ रहा है। आज विश्व आदिवासी दिवस के इस मौके पर झारखंड राज्य में अपने प्राणों की आहुति देने वाले हुलउलगुलान के क्रांति नायकों- बिरसा मुंडा, सिदो-कान्हू, फूलो-झानो, सिंदराय-बिंदराय, तेलेंगा खड़िया, तिलका मांझी, गया मुंडा, डोंका मुंडा, वीर बुधु भगत, जतरा टाना भगत जैसे नायकों के संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए संकल्प लेने की आवश्यकता है, ताकि समय और समाज की मार झेल रहे आदिवासियों को फिर से उनके पारम्परिक और संपन्न रूप में वापस लाया जा सके। 

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