याचिका में तर्क दिया गया है कि क्योंकि यह स्थल पहले ही एक विवादित धार्मिक स्थल के रूप में अदालत में लंबित है, इसलिए मुसलमानों को वहां नमाज़ पढ़ने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे हिंदू पक्ष को पूजा करने की अनुमति नहीं है। याचिकाकर्ता के वकील बाबूलाल सक्सेना के अनुसार, जब तक स्थल की ऐतिहासिक और कानूनी स्थिति का निर्णय नहीं हो जाता, तब तक किसी भी पक्ष को धार्मिक क्रियाकलाप की छूट नहीं दी जानी चाहिए।
गौरतलब है कि शाही जामा मस्जिद और हरिहर मंदिर के बीच भूमि विवाद का मामला पहले से ही अदालत में लंबित है। नवंबर 2023 में आठ हिंदू याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि यह मस्जिद असल में हरिहर मंदिर का हिस्सा है। इसके बाद 19 और 24 नवंबर को दो बार स्थल का सर्वे कराया गया। दूसरे सर्वे के दौरान हुई हिंसा में चार लोगों की मौत हो गई थी और 29 पुलिसकर्मी घायल हुए थे।
इस हिंसा के बाद समाजवादी पार्टी के सांसद जियाउर्रहमान बर्क, मस्जिद समिति के अध्यक्ष जफर अली सहित 2750 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया था। अब तक 96 लोगों को जेल भेजा जा चुका है। स्थानीय अदालत द्वारा सर्वेक्षण का आदेश दिए जाने के बाद हाईकोर्ट ने भी उस निर्णय को बरकरार रखा, जिससे मामले की संवेदनशीलता और कानूनी जटिलता और बढ़ गई है।





