इसके बाद, बिहार विधान परिषद के कार्यवाहक अध्यक्ष अवधेश नारायण सिंह ने इस मामले की जांच के लिए आचार समिति का गठन किया था। आचार समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि जब सोहैब ने अपनी टिप्पणी के लिए खेद व्यक्त किया, तब सुनील कुमार सिंह ने कोई खेद नहीं जताया और अपनी बात पर अडिग रहे। इसके बाद, 14 फरवरी को बिहार विधान परिषद ने ध्वनि मत से उन्हें सदन से निष्कासित करने का प्रस्ताव पारित किया था।
सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद, यह मामला और भी जटिल हो गया। पहले, 6 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया था कि विधायकों को सदन में असंतोष जताते समय मर्यादित रहना चाहिए। इसी संदर्भ में बिहार विधान परिषद ने यह तर्क दिया था कि सुनील कुमार सिंह को निष्कासित करने में पूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया था, और उन्होंने इस निर्णय को चुनौती दी थी।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने इस मामले पर सुनवाई की और इस पर निर्णय को सुरक्षित रख लिया। इस दौरान, वरिष्ठ वकील रंजीत कुमार ने कोर्ट में कहा कि सुनील कुमार सिंह पहले भी कदाचार में संलिप्त रहे हैं और उनके द्वारा सदन में किया गया आचरण ठीक नहीं था। वहीं, सुनील कुमार सिंह की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी और गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि सिंह ने सिर्फ इतना कहा था कि लोग कहते हैं कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को "पलटूराम" कहा जाता है, जो कि उनकी आलोचना करने का तरीका था, न कि किसी तरह का अपमान।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब यह देखा जाएगा कि क्या बिहार विधान परिषद और राजद के अन्य नेता इस निर्णय को स्वीकार करते हैं या नहीं। साथ ही, यह भी सवाल उठता है कि क्या इस फैसले के बाद सुनील कुमार सिंह को बिहार विधान परिषद में फिर से शामिल किया जाएगा या उनकी भूमिका में कोई बदलाव होगा।
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