इसी कड़ी में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी मुख्य चुनाव आयुक्त से मुलाकात कर अपनी नाराज़गी जताई। उन्होंने कहा कि आयोग ने इतनी महत्वपूर्ण प्रक्रिया शुरू करने से पहले किसी राष्ट्रीय दल से चर्चा नहीं की। बीएलओ यानी बूथ लेवल अधिकारियों को इस प्रक्रिया के लिए न तो ठीक से प्रशिक्षित किया गया है और न ही उन्हें ज़रूरी गाइडलाइन या हैंडबुक मुहैया कराई गई है। ऐसे में यह पूरी कवायद अव्यवस्थित और एकतरफा नज़र आ रही है।
ओवैसी ने तीखे सवाल उठाते हुए पूछा कि जब 2024 की मतदाता सूची के आधार पर लोगों ने हाल ही में वोट डाला है, तो 2025 में उन्हीं लोगों से दोबारा पहचान संबंधी दस्तावेज क्यों माँगे जा रहे हैं? उन्होंने यह भी पूछा कि इतनी जल्दी में यह पुनरीक्षण क्यों किया जा रहा है, जबकि ज़्यादातर प्रवासी मज़दूरों या ग्रामीण इलाकों के लोगों के पास आवश्यक दस्तावेज़ नहीं होते। AIMIM के विधायक अख्तरुल ईमान ने भी इस प्रक्रिया पर सवाल उठाए और कहा कि इससे समाज के कमजोर वर्गों के बड़े हिस्से को मतदान से वंचित किए जाने की आशंका है।
इस मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने भी संज्ञान लिया है। कोर्ट ने 10 जुलाई को इस मामले की सुनवाई निर्धारित की है और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है। अब तक इस प्रक्रिया के खिलाफ पांच याचिकाएं दाखिल की जा चुकी हैं। इनमें लोकतंत्र और चुनाव सुधार से जुड़ी प्रतिष्ठित संस्था ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (ADR) की याचिका के साथ-साथ महुआ मोइत्रा, योगेंद्र यादव, राजद सांसद मनोज झा और मुजाहिद आलम की याचिकाएं शामिल हैं। इन सभी याचिकाओं में यह दावा किया गया है कि आयोग का यह कदम मनमाना है और यह निष्पक्ष चुनाव की प्रक्रिया को कमजोर करता है।





