इस मामले में RJD सांसद मनोज झा, TMC सांसद महुआ मोइत्रा और चुनाव सुधार से जुड़ा संगठन ADR (एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स) याचिकाकर्ता हैं। इनका आरोप है कि चुनाव आयोग द्वारा बिहार में SIR की प्रक्रिया शुरू करना न सिर्फ असंवैधानिक है, बल्कि यह चुनावी निष्पक्षता पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
मनोज झा ने आयोग के आदेश को रद्द करने की मांग करते हुए कहा कि चुनाव से ठीक पहले इस तरह की प्रक्रिया से आशंका पैदा होती है कि यह मतदाता सूची की छंटनी का हथकंडा है।
महुआ मोइत्रा ने अपनी याचिका में स्पष्ट रूप से कहा है कि अगर SIR आदेश को रद्द नहीं किया गया, तो यह बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं को उनके अधिकार से वंचित कर सकता है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से यह भी अपील की कि चुनाव आयोग को अन्य राज्यों में भी इस तरह के आदेश जारी करने से रोका जाए।
चुनाव आयोग का पक्ष है कि Special Intensive Revision प्रक्रिया का उद्देश्य केवल अपात्र मतदाताओं को सूची से हटाना और वोटर लिस्ट को स्वच्छ बनाना है।
आयोग का दावा है कि इससे लोकतंत्र मज़बूत होगा, लेकिन विपक्ष इसे एक सुनियोजित राजनीतिक रणनीति करार दे रहा है।
बिहार में इस साल के अंत तक विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं और इस फैसले को लेकर राज्य में सियासी तापमान पहले ही चढ़ चुका है। अब देखना होगा कि 10 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में क्या रुख सामने आता है।





