दिल्ली सरकार के अधीन स्कूलों में 12,748 कक्षाओं और भवनों के निर्माण को लेकर एक नया बड़ा घोटाला सामने आया है, जिसमें आम आदमी पार्टी (AAP) के कार्यकाल के दौरान करीब ₹2,000 करोड़ रुपये की भारी वित्तीय अनियमितताओं का आरोप लगा है। इस संबंध में भ्रष्टाचार निरोधक शाखा (ACB) ने जांच शुरू करते हुए केस दर्ज कर लिया है। इस मामले में ACB ने यह भी स्पष्ट किया है कि मामला दर्ज करने से पहले भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (POCA) की धारा 17A के तहत सक्षम प्राधिकारी से विधिवत अनुमति प्राप्त की गई थी।
ACB द्वारा जारी विस्तृत बयान में बताया गया है कि यह निर्माण कार्य ‘अर्ध-स्थायी संरचनाओं’ का था, जिनकी अनुमानित उम्र लगभग 30 वर्ष होती है, लेकिन इनका निर्माण उसी लागत पर किया गया, जिस पर ‘स्थायी आरसीसी कक्षाएं’ (75 वर्ष की आयु) बनती हैं। इससे यह स्पष्ट है कि परियोजना में कोई वित्तीय समझदारी या लागत प्रभाविता नहीं अपनाई गई।
ACB ने यह भी बताया कि इस महंगी परियोजना के ठेके उन 34 ठेकेदारों को दिए गए, जिनमें से अधिकांश का सीधा या परोक्ष रूप से आम आदमी पार्टी से कथित संबंध है। टेंडर प्रक्रिया में भारी अनियमितता सामने आई, जहां एक स्कूल कक्षा के निर्माण की लागत ₹24.86 लाख प्रति कक्षा दिखाई गई, जबकि आमतौर पर दिल्ली में ऐसी कक्षाएं ₹5 लाख की लागत में बन जाती हैं।
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) के मुख्य तकनीकी परीक्षक (CTE) द्वारा इस परियोजना की जांच रिपोर्ट पहले ही तैयार कर ली गई थी, जिसमें गंभीर वित्तीय और तकनीकी विसंगतियों की ओर इशारा किया गया था। लेकिन यह रिपोर्ट लगभग तीन वर्षों तक जानबूझकर दबाकर रखी गई, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी सवाल उठने लगे हैं।
ACB ने आरोप लगाया है कि बिना किसी खुली प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया के, निजी सलाहकार और आर्किटेक्ट नियुक्त किए गए और उनके माध्यम से निर्माण की लागत को और अधिक बढ़ा दिया गया। साथ ही, निर्माण कार्यों में न केवल निर्धारित समय सीमा का उल्लंघन हुआ, बल्कि गुणवत्ता और सामग्री के मानकों में भी गंभीर समझौता किया गया।
इस घोटाले के उजागर होने के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेताओं — हरीश खुराना, कपिल मिश्रा और नीलकंठ बख्शी — ने इस पूरे मामले को लेकर सरकार की कड़ी आलोचना की है और तत्काल उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। उन्होंने इसे शिक्षा के नाम पर जनता के विश्वास के साथ किया गया धोखा करार दिया।
अब इस मामले ने न केवल राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है, बल्कि शिक्षा क्षेत्र की योजनाओं में पारदर्शिता, जवाबदेही और भ्रष्टाचार मुक्त प्रक्रिया को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस मामले की जांच में जैसे-जैसे नए दस्तावेज और साक्ष्य सामने आ रहे हैं, वैसे-वैसे यह स्पष्ट हो रहा है कि यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि एक सुनियोजित वित्तीय घोटाले की आशंका को जन्म देता है।





