जी-7 के इस कदम को पश्चिमी देशों द्वारा चीन के प्रति सख्त रुख के तौर पर देखा जा रहा है।
जी-7 के विदेश मंत्रियों के इस संयुक्त बयान में चीन द्वारा ताइवान पर किए जा रहे "जबरदस्ती" के प्रयासों की कड़ी निंदा की गई। यह बयान फरवरी में जापान और अमेरिका के संयुक्त बयान के अनुरूप था, जिसमें ताइवान को लेकर चीन की कार्रवाई की आलोचना की गई थी। ताइवान खुद को स्वतंत्र राष्ट्र मानता है, जबकि चीन उसे अपना हिस्सा मानता है। जी-7 के इस बदलाव को लेकर विशेषज्ञों का मानना है कि यह चीन के प्रति पश्चिमी देशों की अधिक सख्त नीति को दर्शाता है, जो लंबे समय से क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर अहम भूमिका निभाते हैं।
इस बयान में जी-7 देशों ने चीन के परमाणु हथियारों के बढ़ते जखीरे पर भी चिंता जताई। हालांकि, इस बयान में शिनजियांग, तिब्बत और हांगकांग में मानवाधिकारों के उल्लंघन के मुद्दे को शामिल नहीं किया गया, जो कि पहले के बयानों में था।
इसके अलावा, पिछले बयानों में चीन के साथ "रचनात्मक और स्थिर संबंधों" की इच्छा जताने वाली पंक्तियां भी हटा दी गईं। साथ ही, "सीधे और स्पष्ट संवाद के जरिए मतभेदों को हल करने" जैसी बातें भी इस बार के बयान से बाहर कर दी गईं। ये बदलाव इस बात को दर्शाते हैं कि जी-7 देशों के रिश्ते अब चीन के साथ पहले से कहीं ज्यादा कड़े हो गए हैं।
नवंबर में जारी बयान में जी-7 ने अपनी "एक चीन नीति" को पुनः दोहराया था, लेकिन इस बार उसे हटा दिया गया है। 'एक चीन' नीति के तहत चीन को आधिकारिक रूप से मान्यता दी जाती है और ताइवान के साथ अनौपचारिक संबंध बनाए रखने की बात कही जाती है। इस बदलाव ने चीन को चौंका दिया है, और उसे यह कदम अपने आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप के रूप में दिखाई दिया है। जी-7 देशों ने बयान में यह भी कहा कि वे "ताइवान जलडमरूमध्य में शांति और स्थिरता बनाए रखने का समर्थन करते हैं और यथास्थिति को बलपूर्वक या जबरदस्ती बदलने के किसी भी एकतरफा प्रयास का विरोध करते हैं।"
चीन ने जी-7 के इस बयान पर तीखी प्रतिक्रिया दी है और इसे "तथ्यों की अनदेखी और चीन की संप्रभुता को ठेस पहुंचाने वाला" कदम बताया। चीनी दूतावास ने कहा कि जी-7 देशों की यह हरकत चीन के आंतरिक मामलों में गंभीर हस्तक्षेप है और इसे किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
चीन ने स्पष्ट किया कि ताइवान मुद्दे पर शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए "एक चीन सिद्धांत" का पालन किया जाना चाहिए।
इसके अलावा, जी-7 देशों के विदेश मंत्रियों ने दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर में बढ़ते तनाव को लेकर भी चिंता व्यक्त की है। खासतौर पर, उन्होंने चीन द्वारा फिलीपींस और वियतनाम के खिलाफ किए गए "खतरनाक सैन्य कार्रवाइयों" और "जल तोपों के इस्तेमाल" पर गंभीर चिंता जताई। जी-7 देशों ने चीन से अपील की कि वह अपनी "गैर-बाजार नीतियों" से बचें, जो वैश्विक व्यापार को बाधित कर सकती हैं और उद्योगों में असंतुलन पैदा कर सकती हैं। इस पर चीन ने जी-7 देशों को उत्तर देते हुए कहा कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र "भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का अखाड़ा नहीं है" और उन्हें "शीत युद्ध की मानसिकता" छोड़ देनी चाहिए।
जी-7, जो सात प्रमुख विकसित देशों का एक समूह है, विश्व के आर्थिक और राजनीतिक मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
इन देशों में अमेरिका, जापान, जर्मनी, यूके, फ्रांस, इटली और कनाडा शामिल हैं। जी-7 देशों का यह समूह हर साल मिलकर वैश्विक नीतियों, व्यापार, सुरक्षा और पर्यावरण जैसे मुद्दों पर चर्चा करता है और उन पर सामूहिक रूप से निर्णय लेता है। यूरोपीय संघ भी जी-7 बैठकों में हिस्सा लेता है, लेकिन उसे औपचारिक सदस्य नहीं माना जाता है। जी-7 के देशों का समूह वैश्विक मुद्दों पर अपने सामूहिक प्रभाव का इस्तेमाल करता है, और वैश्विक आर्थिक प्रवृत्तियों को दिशा देने में मदद करता है।
इस बार के जी-7 बयान में ताइवान को लेकर "जबरदस्ती" शब्द का उपयोग अमेरिकी और जापानी प्रभाव को दर्शाता है। पिछले महीने, जापानी प्रधानमंत्री शिगेरू इशिबा और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी इस शब्द का इस्तेमाल किया था। हालांकि, ट्रंप प्रशासन की चीन नीति के बारे में अभी स्पष्टता नहीं है, लेकिन उनके प्रशासन में कई चीन विरोधी रणनीतिकारों की नियुक्ति की गई है। इसके अलावा, शी जिनपिंग और ट्रंप के बीच एक संभावित बैठक की भी चर्चा चल रही है। इस बीच, जी-7 के विदेश मंत्री कनाडा के ला माल्बे नामक पर्यटन स्थल पर बैठक कर रहे हैं, जहां वे चीन से संबंधित वैश्विक मामलों पर विस्तार से चर्चा कर रहे हैं।
Read This Also:- लद्दाख में चीन के 'नए जिलों' पर केंद्र की दो-टूक, कहा – अवैध कब्जे को कभी नहीं मानेंगे
Read This Also:- लद्दाख में चीन के 'नए जिलों' पर केंद्र की दो-टूक, कहा – अवैध कब्जे को कभी नहीं मानेंगे





