विधानसभा से बाहर जाने के बाद, आम आदमी पार्टी के नेताओं ने एक मार्च निकाला, जिसमें नेता प्रतिपक्ष आतिशी ने भाजपा पर कड़ा हमला किया। उन्होंने कहा कि भाजपा को इतनी अहंकार हो गया है कि वह अब बाबासाहेब आंबेडकर जैसी महान हस्तियों के स्थान पर अपने नेता नरेंद्र मोदी की तस्वीरें लगाने का प्रयास कर रही है। उन्होंने इस मुद्दे को उठाते हुए भाजपा से सवाल किया कि क्या उन्हें यह लगता है कि नरेंद्र मोदी बाबा साहेब से बड़े हैं? यह आरोप भाजपा पर सीधे तौर पर लगाया गया कि पार्टी आंबेडकर की विरासत को नकारने की कोशिश कर रही है। आतिशी ने यह भी कहा कि उनका आंदोलन सदन से लेकर सड़कों तक जारी रहेगा, जब तक बाबा साहेब की तस्वीरें वापस नहीं लगाई जातीं।
वहीं, गोपाल राय ने सदन में इस दिन पेश की जाने वाली सीएजी रिपोर्ट को लेकर कहा कि अब सारी सच्चाई सामने आ जाएगी। उन्होंने कहा कि वह भी चाहते हैं कि रिपोर्ट सभी के सामने आए ताकि जनता को वास्तविकता का पता चले।
हालांकि, उन्होंने यह भी जताया कि जिस तरीके से सरकार ने पहले दिन सदन में कार्यवाही की शुरुआत की और हमारे दो महान राष्ट्रनायकों, बाबा साहेब आंबेडकर और भगत सिंह की तस्वीरों को हटाया, उससे भाजपा की असली मंशा स्पष्ट हो गई है। गोपाल राय ने कहा कि हम सीएजी रिपोर्ट का स्वागत करते हैं, लेकिन पहले इस मुद्दे पर चर्चा की जानी चाहिए, और फिर हम अपनी बात रखेंगे।
आप और भाजपा के बीच यह विवाद विशेष रूप से उस समय बढ़ा जब भाजपा ने आरोप लगाया कि आप सरकार ने सीएजी रिपोर्ट को जानबूझकर रोका था। पार्टी का कहना था कि रिपोर्ट्स को देर से पेश कर यह कोशिश की गई कि वित्तीय कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार के मामलों को दबाया जा सके। विधानसभा चुनावों के दौरान इस मुद्दे को लेकर भाजपा ने इसे एक चुनावी मुद्दा बनाया और आम आदमी पार्टी पर गंभीर आरोप लगाए।
एक और महत्वपूर्ण मुद्दा यह था कि जिन रिपोर्टों को पेश किया जा रहा था, उनमें से एक मुख्यमंत्री के सरकारी आवास के मरम्मत कार्य से संबंधित थी, जिसे भाजपा ने 'शीश महल' करार दिया था।
रिपोर्ट में कहा गया था कि इस परियोजना में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं थीं, और इसके लिए प्रारंभ में स्वीकृत 7.61 करोड़ रुपये की लागत बढ़कर 33.66 करोड़ रुपये हो गई थी, जो कि 342 प्रतिशत की बढ़ोतरी थी। भाजपा ने इस मामले को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर आरोप लगाया और उन्हें सार्वजनिक धन के दुरुपयोग का दोषी ठहराया।
इसके अलावा, दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना ने पहले भी इन रिपोर्टों को सार्वजनिक न किए जाने पर चिंता जताई थी। उन्होंने दिसंबर में विधानसभा से विशेष सत्र बुलाने का आग्रह किया था, ताकि इन रिपोर्टों को संसद में पेश किया जा सके। हालांकि, आप के कार्यकाल के दौरान यह रिपोर्टें पेश नहीं की गईं, जिससे लगातार इन रिपोर्टों को सार्वजनिक करने की मांग उठती रही।
इस पूरे विवाद में, जहां एक ओर आम आदमी पार्टी अपने आंदोलन और संघर्ष को जारी रखने की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर भाजपा इसे दिल्ली की जनता के हितों के लिए एक बड़े मुद्दे के रूप में पेश कर रही है। इन सभी घटनाक्रमों से यह साफ होता है कि दिल्ली विधानसभा सत्र के दौरान राजनीतिक गतिरोध और आरोप-प्रत्यारोप की स्थिति और भी तेज हो सकती है।
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