अनुसूचित जनजातियों के हितों का मुद्दा
नुरुल हसन की याचिका में विशेष रूप से यह आपत्ति जताई गई है कि अगर कोई अनुसूचित जनजाति से संबंधित व्यक्ति इस्लाम धर्म अपना लेता है, तो वर्तमान कानून के तहत उसे अपनी जमीन को वक्फ संपत्ति घोषित करने का अधिकार नहीं मिलता। याचिका में इसे धार्मिक स्वतंत्रता और संपत्ति के अधिकार का उल्लंघन करार दिया गया है। याचिकाकर्ता ने यह भी कहा है कि वक्फ की गई संपत्ति पर उत्तराधिकार कानूनों को निष्क्रिय कर देना भी उचित नहीं है, क्योंकि इससे एक व्यक्ति की व्यक्तिगत संपत्ति पर परिवार के अन्य सदस्यों के हक प्रभावित होते हैं।
इसके अलावा, याचिका में इस प्रावधान पर भी सवाल उठाया गया है कि कम से कम पांच वर्षों तक मुस्लिम रह चुके व्यक्ति को ही वक्फ संपत्ति घोषित करने का अधिकार क्यों दिया जाए। याचिकाकर्ता का मानना है कि यह शर्त न केवल भेदभावपूर्ण है बल्कि संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ भी है। अब तक वक्फ संशोधन कानून के खिलाफ 20 से अधिक याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दायर की जा चुकी हैं। इनमें से अधिकतर याचिकाएं विपक्षी दलों से जुड़े नेताओं या सामाजिक संगठनों द्वारा दायर की गई हैं। लेकिन अब बीजेपी की सहयोगी दो प्रमुख पार्टियों—JDU और NPP—के नेताओं की सक्रियता ने इस मुद्दे को एक नया राजनीतिक आयाम दे दिया है।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश संजय खन्ना की अध्यक्षता वाली तीन-न्यायाधीशों की पीठ अब इस संवेदनशील मामले की सुनवाई 16 अप्रैल को करेगी। माना जा रहा है कि यह सुनवाई वक्फ कानून को लेकर मौजूदा राजनीतिक और संवैधानिक बहस को नई दिशा दे सकती है।





