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महुआ मोइत्रा मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान जज की तीखी टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी आवास आवंटन के लिए मानक संचालन प्रक्रिया बनाने का सुझाव दिया।

महुआ मोइत्रा मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान जज की तीखी टिप्पणी
फोटो: Supreme Court's Sharp Remarks During Hearing on Mahua Moitra Case

महुआ मोइत्रा के मामले में तीखी बहस

सुप्रीम कोर्ट में तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा से संबंधित एक मामले पर सुनवाई चल रही थी। इस दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची और महुआ के वकील गोपाल शंकरनारायणन के बीच काफी गर्मागर्मी देखने को मिली। वकील ने आरोप लगाया कि दिल्ली के विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी सुनवाई में कोर्ट की बेंच कोर्टरूम को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने में असफल रही।


इस विवाद के बाद जस्टिस बागची ने शंकरनारायणन को संबोधित करते हुए कहा, 'देखिए, मिस्टर शंकरनारायणन। आप खुद कोर्ट में वही कर रहे हैं जिसके बारे में आप कहते हैं कि आपको पसंद नहीं है। यदि आप ही नियंत्रक बनेंगे, तो हम कोर्ट को कैसे नियंत्रित करेंगे? थोड़ा धैर्य रखें।' यह टिप्पणी उस समय आई जब शंकरनारायणन और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के बीच तीखी बहस चल रही थी।


शंकरनारायणन का अलग होना

शंकरनारायणन ने उन सभी सात मामलों से खुद को अलग करने का निर्णय लिया, जिनमें वे दिल्ली के विरोध प्रदर्शनों से संबंधित सुनवाई में शामिल थे। उनका कहना था कि बेंच कार्यवाही को नियंत्रित नहीं कर पा रही है, जिससे उन्हें अलग होना पड़ा।


इस बीच, महुआ मोइत्रा के केस में सुप्रीम कोर्ट ने सांसदों और अन्य सरकारी अधिकारियों को सरकारी सर्किट हाउस और गेस्ट हाउस के आवंटन के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) बनाने का सुझाव दिया। यह सुझाव उस विवाद के संदर्भ में आया जिसमें महुआ मोइत्रा के कथित निकाले जाने का मामला था।


सर्किट हाउस से निकाले जाने का विवाद

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने महुआ मोइत्रा के सर्किट हाउस से निकाले जाने के आरोपों का खंडन किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि सर्किट हाउस में मरम्मत का कार्य चल रहा था, इसलिए महुआ को केवल वैकल्पिक सरकारी स्थान देने का प्रस्ताव दिया गया था।


सीजेआई सूर्यकांत ने इस मामले में टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे विवाद सामान्यतः सुप्रीम कोर्ट तक नहीं पहुंचने चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि पहले से सूचना देने के लिए एक व्यावहारिक तरीका अपनाया जाना चाहिए, बजाय इसके कि नोटिस भेजने की अनिवार्यता को लागू किया जाए।