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मुलायम सिंह यादव की सियासी विरासत: गठबंधन, गेस्ट हाउस कांड और बेटे अखिलेश से सत्ता की जंग तक

मुलायम सिंह यादव का सियासी सफर, गेस्ट हाउस कांड, रक्षा मंत्री का पद, अमर सिंह से दोस्ती और अखिलेश यादव के साथ सत्ता की जंग की पूरी कहानी।

मुलायम सिंह यादव की सियासी विरासत: गठबंधन, गेस्ट हाउस कांड और बेटे अखिलेश से सत्ता की जंग तक
फोटो: मुलायम सिंह यादव , अखिलेश यादव, गेस्ट हाउस कांड 1995 , समाजवादी पार्टी का इतिहास, मुलायम सिंह यादव राजनीतिक सफर

उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुलायम सिंह यादव का नाम उन नेताओं में शामिल है, जिन्होंने गठबंधन, सामाजिक समीकरण और राजनीतिक रणनीति के दम पर कई बार सत्ता हासिल की। उनका राजनीतिक सफर संघर्ष, उतार-चढ़ाव, विवादों और पारिवारिक टकरावों से भरा रहा। 1995 के चर्चित गेस्ट हाउस कांड से लेकर रक्षा मंत्री बनने और समाजवादी पार्टी की कमान अखिलेश यादव को सौंपने तक उनकी कहानी भारतीय राजनीति के कई अहम अध्यायों को सामने लाती है।

 

मुलायम-कांशीराम गठबंधन और गेस्ट हाउस कांड

1990 में अयोध्या गोलीकांड के बाद मुलायम सिंह यादव की राजनीति में बड़ा बदलाव आया। 1991 के चुनाव में बीजेपी ने 221 सीटें जीतकर सरकार बनाई। इसके बाद मुलायम सिंह ने 4 अक्टूबर 1992 को समाजवादी पार्टी की स्थापना की। 1993 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने कांशीराम के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन किया। नारा गूंजा- 'मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम।'

गठबंधन के बाद मुलायम सिंह दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। हालांकि, 2 जून 1995 को लखनऊ के मीराबाई मार्ग स्थित सरकारी गेस्ट हाउस में सपा समर्थकों और बसपा नेताओं के बीच हिंसक टकराव हुआ। मायावती को कमरे में बंद होकर अपनी सुरक्षा करनी पड़ी। इस घटना के बाद बसपा ने समर्थन वापस ले लिया और अगले दिन मायावती मुख्यमंत्री बन गईं।

 

रक्षा मंत्री बने, प्रधानमंत्री बनने का भी मिला मौका

1996 में मुलायम सिंह यादव केंद्र की संयुक्त मोर्चा सरकार में रक्षा मंत्री बने। इसी दौरान अमर सिंह उनके करीबी सहयोगी बनकर उभरे। 1997 में प्रधानमंत्री पद के लिए भी मुलायम सिंह का नाम चर्चा में आया, लेकिन राजनीतिक सहमति नहीं बन सकी और एचडी देवगौड़ा के बाद इंद्र कुमार गुजराल प्रधानमंत्री बने।

2002 में सपा सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन बीजेपी-बसपा गठबंधन के कारण मुलायम को इंतजार करना पड़ा। अगस्त 2003 में उन्होंने तीसरी बार मुख्यमंत्री पद संभाला। इस दौरान राजा भैया की वापसी, आय से अधिक संपत्ति के आरोप और सैफई महोत्सव की भव्यता को लेकर उनकी सरकार सवालों में रही।

 

अमर सिंह से विवाद और अखिलेश यादव का उदय

2008 के कैश फॉर वोट मामले में अमर सिंह का नाम चर्चा में आया। 2009 में कल्याण सिंह से नजदीकी और आजम खान से टकराव ने पार्टी के भीतर विवाद बढ़ाया। जनवरी 2010 में अमर सिंह ने इस्तीफा दिया और फरवरी में उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया।

इसके बाद अखिलेश यादव को पार्टी का नया चेहरा बनाया गया। 2012 में समाजवादी पार्टी ने 224 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया और 38 वर्षीय अखिलेश मुख्यमंत्री बने।

 

पिता-पुत्र की जंग और साइकिल चुनाव चिन्ह की लड़ाई

2016 में शिवपाल यादव और अखिलेश यादव के बीच मतभेद बढ़ने लगे। अमर सिंह की वापसी और कौमी एकता दल के विलय को लेकर विवाद गहराया। दिसंबर 2016 में मुलायम सिंह ने अखिलेश को पार्टी से निष्कासित कर दिया, लेकिन विधायकों का समर्थन अखिलेश के साथ रहा।

जनवरी 2017 में अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। चुनाव आयोग ने पार्टी का नाम और साइकिल चुनाव चिन्ह उनके गुट को सौंप दिया। 2019 में मुलायम मैनपुरी से सांसद बने। 10 अक्टूबर 2022 को 82 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। उनकी राजनीतिक विरासत आज भी उत्तर प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखती है।

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