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कर्जत में 32 हजार पेड़ों की कटाई पर सवाल, आदिवासी परिवारों के अधिकारों का क्या होगा?

महाराष्ट्र के कर्जत में बिजली परियोजना के लिए 32 हजार पेड़ों की कटाई प्रस्तावित है। जंगल पर निर्भर 150 आदिवासी परिवारों के अधिकार सवालों में हैं।

कर्जत में 32 हजार पेड़ों की कटाई पर सवाल, आदिवासी परिवारों के अधिकारों का क्या होगा?
फोटो: Karjat Forest, Project Torrent Power, Tribal Rights, Pump Storage Project, Forest Rights Act

377 हेक्टेयर जमीन पर बिजली परियोजना महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के कर्जत में टॉरेंट पावर 3000 मेगावाट क्षमता की पंप स्टोरेज बिजली परियोजना विकसित कर रही है। परियोजना के लिए 377 हेक्टेयर जमीन की जरूरत बताई गई है, जिसमें 233 हेक्टेयर वन विभाग की भूमि शामिल है। इसके लिए 32 हजार से ज्यादा पेड़ों की कटाई प्रस्तावित है।

सरकार का तर्क है कि परियोजना से बिजली की जरूरत पूरी करने और कोयले पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी। पंप स्टोरेज तकनीक में कम मांग के समय पानी को ऊंचाई पर पहुंचाया जाता है और जरूरत बढ़ने पर उसी पानी से बिजली बनाई जाती है।

जंगल पर निर्भर 150 परिवारों की चिंता परियोजना क्षेत्र की छह बस्तियों में करीब 150 परिवार रहते हैं, जिनमें बड़ी संख्या कटकरी आदिवासी समुदाय की है। इन परिवारों की आजीविका जंगल से जुड़ी है। वे सूखी लकड़ी बेचकर प्रतिदिन करीब 150 से 200 रुपये कमाते हैं। इसके अलावा शहद, महुआ, जामुन और दूसरे वन उत्पाद उनके भोजन और आय का हिस्सा हैं। नीम, गिलोय और अडूसा जैसी जड़ी-बूटियां पारंपरिक उपचार में भी इस्तेमाल होती हैं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन परिवारों की जंगल पर निर्भरता सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज क्यों नहीं हुई। वन अधिकार कानून, 2006 के तहत ग्राम सभा की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन कर्जत के पाली गांव में संबंधित प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। रिपोर्ट के अनुसार, वन विभाग को ग्राम सभा से ऐसा रिकॉर्ड नहीं मिला जिसमें इन परिवारों की जंगल पर निर्भरता दर्ज हो।

पेड़ों की कटाई का विरोध, करीब 1100 पेड़ कट चुके परियोजना के खिलाफ स्थानीय ग्रामीणों ने विरोध किया। दशहरे की सुबह पेड़ों की कटाई शुरू होने के बाद पांच गांवों के लोग मौके पर पहुंचे। विरोध के दौरान राजनीतिक नेताओं और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने भी हिस्सा लिया। तब तक करीब 1100 पेड़ काटे जा चुके थे। इसके बाद कटाई अस्थायी रूप से रोक दी गई। वन विभाग ने कानून-व्यवस्था की स्थिति को इसकी वजह बताया।

कर्जत से हसदेव और नियमगिरी तक बड़ा सवाल कर्जत का मामला अकेला नहीं है। छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य में कोयला परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर वन भूमि के इस्तेमाल और पेड़ों की कटाई को लेकर लंबे समय से विवाद रहा है। वहीं ओडिशा के नियमगिरी में डोंगरिया कोंध समुदाय ने खनन परियोजना का विरोध किया था। 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने ग्राम सभाओं को धार्मिक, सांस्कृतिक और सामुदायिक अधिकारों पर विचार करने की भूमिका दी, जिसके बाद संबंधित ग्राम सभाओं ने खनन प्रस्ताव को खारिज कर दिया।

कर्जत में सरकार का कहना है कि 32 हजार से अधिक पेड़ों की कटाई के बदले करीब 90 हजार पेड़ लगाए जाएंगे। परियोजना के दौरान करीब 2000 लोगों को रोजगार देने के साथ अस्पताल, स्कूल विकास और कौशल प्रशिक्षण केंद्र जैसी सुविधाओं का भी प्रस्ताव है।

हालांकि मुख्य सवाल बना हुआ है—क्या नए पेड़ लगाना उस जंगल की भरपाई कर सकता है, जिस पर पीढ़ियों से परिवारों की आजीविका, भोजन और जीवन निर्भर रहा है? यही बहस कर्जत में विकास और आदिवासी अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर नए सवाल खड़े करती है।

इस पूरी खबर को वीडियो फॉर्मेट में देखिए के लिए, क्लिक करें नीचे दिए गए लिंक पर - https://youtu.be/vMtc8DB9zNY?si=5ZafmUJh_1E3fmNn

 
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