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ईरान युद्ध ने डुबोई ट्रम्प की चुनावी नैया, हार के बाद भी बोले- मौका मिला तो फिर हमला करूंगा

ईरान युद्ध ने बिगाड़ा ट्रम्प का खेल

ईरान युद्ध ने डुबोई ट्रम्प की चुनावी नैया, हार के बाद भी बोले- मौका मिला तो फिर हमला करूंगा
फोटो: Trump, Election, Iran, War

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी को मिडटर्म चुनाव में बड़ा झटका लगा है। डेमोक्रेटिक पार्टी ने प्रतिनिधि सभा और सीनेट, दोनों में बहुमत हासिल कर लिया है। इस हार के बाद ट्रम्प ने खुद माना कि ईरान के साथ युद्ध का चुनावी नतीजों पर असर पड़ा। हालांकि, उन्होंने अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा कि अगर दोबारा मौका मिला तो वे फिर ईरान पर हमला करेंगे। ट्रम्प के मुताबिक, ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकने के लिए सैन्य कार्रवाई जरूरी थी। लेकिन इस युद्ध की वजह से पेट्रोल की कीमतें बढ़ीं और आम अमेरिकी लोगों पर आर्थिक दबाव पड़ा। इसका असर मतदाताओं के फैसले पर भी दिखाई दिया।

ईरान ने चुनावी नतीजों को बताया अपनी जीत

अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी की हार के बाद ईरान ने इसे अपनी राजनीतिक जीत के तौर पर पेश किया। ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बाकिर कालीबाफ ने कहा कि अमेरिकी जनता ने युद्ध के खिलाफ वोट दिया है। ईरान का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जिस युद्ध को ट्रम्प अपनी सुरक्षा नीति का हिस्सा बता रहे थे, उसी के कारण अब उन्हें अपने देश में राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा है। हालांकि, इन नतीजों को ईरान की सैन्य जीत नहीं कहा जा सकता। यह ट्रम्प की युद्ध नीति के खिलाफ अमेरिका में बढ़ती नाराजगी का संकेत जरूर है।

क्या होता है अमेरिका का मिडटर्म चुनाव?

अमेरिका में राष्ट्रपति का कार्यकाल चार साल का होता है। इसके दो साल बाद मिडटर्म चुनाव होते हैं। इसमें प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों और सीनेट की करीब एक-तिहाई सीटों पर चुनाव होता है। अमेरिकी संसद को कांग्रेस कहा जाता है। इसके दो सदन हैं- प्रतिनिधि सभा और सीनेट। इन चुनावों से तय होता है कि दोनों सदनों में किस पार्टी का बहुमत रहेगा। इस बार डेमोक्रेट्स ने दोनों सदनों में रिपब्लिकन को पीछे छोड़ दिया। सीनेट में डेमोक्रेट्स को 54 और रिपब्लिकन को 44 सीटें मिलीं, जबकि दो सीटों के नतीजे बाकी थे। प्रतिनिधि सभा में भी डेमोक्रेट्स ने बहुमत हासिल किया। इस चुनाव का एक खास नतीजा कंसास में देखने को मिला। यहां 1932 के बाद पहली बार डेमोक्रेट उम्मीदवार ने सीनेट की सीट जीती। इससे पता चलता है कि रिपब्लिकन के मजबूत माने जाने वाले इलाकों में भी मतदाताओं का रुख बदला है।

ट्रम्प की अपनी पार्टी में भी नाराजगी

चुनावी हार के बाद ट्रम्प को अपनी ही पार्टी के नेताओं के सवालों का सामना करना पड़ रहा है। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी ईरान युद्ध को हार की वजहों में शामिल किया। रिपब्लिकन नेताओं ने युद्ध के अलावा ट्रम्प की टैरिफ नीति और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के प्रति उनके रुख पर भी सवाल उठाए। कुछ नेताओं ने रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ की भूमिका की आलोचना करते हुए कहा कि युद्ध में शामिल होने के बाद उससे बाहर निकलने की कोई स्पष्ट योजना नहीं बनाई गई। दरअसल, ट्रम्प ने चुनाव से पहले अमेरिकी अर्थव्यवस्था मजबूत करने और देश के हितों को प्राथमिकता देने का वादा किया था। लेकिन ईरान युद्ध, बढ़ती पेट्रोल कीमतों और महंगाई ने उनकी सरकार के सामने मुश्किलें खड़ी कर दीं।

अब संसद में ट्रम्प की मुश्किलें बढ़ेंगी

जनवरी 2027 से डेमोक्रेट्स संसद के दोनों सदनों का नियंत्रण संभालेंगे। इसका सीधा असर ट्रम्प के कामकाज पर पड़ेगा। डेमोक्रेट्स ट्रम्प प्रशासन के फैसलों की जांच कर सकेंगे। वे सरकारी अधिकारियों को संसद में बुलाकर सवाल पूछ सकते हैं। सीनेट में ट्रम्प की नियुक्तियों को मंजूरी मिलने में भी मुश्किल आ सकती है। इसके अलावा नए कानून पास कराना और बजट से जुड़े फैसले लेना भी आसान नहीं होगा। प्रतिनिधि सभा में बहुमत होने के कारण डेमोक्रेट्स राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया भी शुरू कर सकते हैं। हालांकि, राष्ट्रपति को पद से हटाने के लिए सीनेट में दो-तिहाई समर्थन जरूरी होता है। इसके बावजूद ट्रम्प राष्ट्रपति बने रहेंगे और उनके पास वीटो का अधिकार भी होगा।

क्या ईरान पर हमले जारी रखेंगे ट्रम्प?

अब सबसे बड़ा सवाल है कि चुनावी हार के बाद ट्रम्प ईरान के खिलाफ अपनी नीति बदलेंगे या नहीं। एक तरफ युद्ध के कारण उन्हें अपने देश में राजनीतिक नुकसान हुआ है, दूसरी तरफ वे इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी बता रहे हैं। ट्रम्प ने फिलहाल पीछे हटने के संकेत नहीं दिए हैं। उन्होंने साफ कहा है कि जरूरत पड़ने पर वे दोबारा हमला करेंगे।

इस चुनाव ने दिखाया है कि युद्ध का असर केवल सीमा और सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं रहता। इसका असर तेल की कीमतों, आम लोगों की जेब और देश की राजनीति पर भी पड़ता है। ट्रम्प के लिए अब चुनौती सिर्फ ईरान से निपटने की नहीं, बल्कि अपनी ही संसद और जनता का भरोसा बनाए रखने की भी है।