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भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर सवाल, राहुल गांधी के सत्ता परिवर्तन बयान की चर्चा

भारत-अमेरिका ट्रेड डील, हरदीप पुरी की एपस्टीन से जुड़ी तस्वीर, किसान हितों, राहुल गांधी, परिसीमन और मीडिया की भूमिका पर राजनीतिक चर्चा में उठे सवाल।

भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर सवाल, राहुल गांधी के सत्ता परिवर्तन बयान की चर्चा
फोटो: India US Trade Deal | Hardeep Singh Puri | Jeffrey Epstein | Rahul Gandhi | Delimitation

भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते, केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी की जेफरी एपस्टीन के साथ तस्वीर और देश की घरेलू राजनीति को लेकर एक राजनीतिक चर्चा में कई गंभीर सवाल उठाए गए। चर्चा में अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो के भारत दौरे की टाइमिंग, कृषि क्षेत्र में संभावित रियायतों, किसान हितों और परिसीमन की राजनीति पर विस्तार से बात की गई।

 

एपस्टीन की तस्वीर और अमेरिका के साथ व्यापार समझौता

चर्चा की शुरुआत मार्को रुबियो के भारत दौरे और हरदीप सिंह पुरी की जेफरी एपस्टीन के साथ सामने आई तस्वीर से हुई। बातचीत में तस्वीर जारी होने के समय पर सवाल उठाते हुए पूछा गया कि क्या इसका अमेरिका-भारत संबंधों और व्यापार समझौते से कोई संबंध है। पुरी पहले एपस्टीन से मुलाकात की बात स्वीकार कर चुके हैं और उन्होंने इसे अपने पुराने पेशेवर संपर्कों के संदर्भ में समझाया था। हालांकि, चर्चा में तस्वीर की टाइमिंग को लेकर राजनीतिक दबाव और संभावित कूटनीतिक संदेश की आशंका जताई गई। किसी ब्लैकमेलिंग या दबाव की पुष्टि प्रस्तुत नहीं की गई।

मार्को रुबियो के दौरे के दौरान रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी से जुड़ी मुलाकातों और ऊर्जा व्यापार पर भी चर्चा हुई। वक्ताओं ने आरोप लगाया कि अमेरिका भारत को रूसी तेल पर निर्भरता घटाकर अमेरिकी ऊर्जा बाजार की ओर ले जाना चाहता है। साथ ही, भारत-अमेरिका ट्रेड डील के लगभग 99 प्रतिशत हिस्से पर सहमति बनने संबंधी बयान का उल्लेख किया गया। चर्चा में यह सवाल उठाया गया कि समझौते की शर्तें भारत के आर्थिक हितों के अनुरूप हैं या नहीं।

 

कृषि क्षेत्र और किसान आंदोलन की आशंका

चर्चा का एक प्रमुख मुद्दा अमेरिकी कृषि और डेयरी उत्पादों के लिए भारतीय बाजार खोलने की संभावित मांग रही। वक्ताओं ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने किसानों के हितों की अनदेखी करते हुए ऐसी रियायतें दीं, तो देश में एक और किसान आंदोलन खड़ा हो सकता है। तीन कृषि कानूनों के खिलाफ हुए आंदोलन, किसानों की मौतों, न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी और किसानों की आय दोगुनी करने के वादे का संदर्भ दिया गया। वक्ताओं का कहना था कि छोटे किसानों की समस्याओं को केवल पंजाब और हरियाणा तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए।

 

राहुल गांधी, सत्ता परिवर्तन और परिसीमन

चर्चा में राहुल गांधी के कथित ‘पजल 16’ संकेत और सत्ता परिवर्तन की बहस पर भी विचार किया गया। वक्ताओं ने कहा कि लोकतंत्र में आंदोलन करना और चुनाव के माध्यम से सरकार बदलने की मांग करना असामान्य नहीं है। वर्ष 2011-12 के अन्ना आंदोलन और 2014 के चुनाव का उदाहरण देते हुए कहा गया कि जनसमर्थन मिलने पर आंदोलन राजनीतिक बदलाव का रास्ता बना सकते हैं।

परिसीमन और महिला आरक्षण के मुद्दे पर वक्ताओं ने आरोप लगाया कि लोकसभा सीटों के पुनर्निर्धारण की प्रक्रिया राजनीतिक लाभ से प्रभावित हो सकती है। दक्षिणी राज्यों की चिंताओं और उत्तर भारत में सीटें बढ़ने की संभावनाओं का उल्लेख करते हुए कहा गया कि जनसंख्या आधारित परिसीमन क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को लेकर विवाद पैदा कर सकता है। हालांकि, इन आशंकाओं को चर्चा में व्यक्त राजनीतिक विश्लेषण के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

 

अमित शाह, मीडिया और लॉरेंस बिश्नोई पर सवाल

बातचीत में राहुल गांधी द्वारा अमित शाह के कथित घरेलू नाम ‘पूनम’ का उल्लेख किए जाने को उनकी मजबूत राजनीतिक छवि पर व्यंग्यात्मक हमले के रूप में पेश किया गया। मीडिया की भूमिका, राजनीतिक दलों और संपादकों के व्यक्तिगत संबंधों तथा सरकारी विज्ञापनों के प्रभाव पर भी सवाल उठाए गए। वक्ताओं ने आरोप लगाया कि विपक्षी दल मीडिया के साथ अपने संबंधों और राजनीतिक संदेशों को प्रभावी ढंग से संभालने में कमजोर पड़ते हैं।

अंतिम हिस्से में लॉरेंस बिश्नोई से जुड़े अपराधों और जेल से कथित तौर पर गिरोह चलाए जाने के मुद्दे पर चर्चा हुई। वक्ताओं ने केंद्रीय गृह मंत्रालय और अमित शाह से सवाल किया कि विभिन्न राज्यों की पुलिस को बिश्नोई से अपने राज्य में पूछताछ करने की अनुमति क्यों नहीं मिलती। इस संबंध में चर्चा में एक लिखित आदेश का दावा किया गया, लेकिन उसकी स्वतंत्र पुष्टि प्रस्तुत नहीं की गई।

कुल मिलाकर, चर्चा में भारत-अमेरिका संबंधों, किसानों के हितों, चुनावी राजनीति, परिसीमन, मीडिया की जवाबदेही और कानून-व्यवस्था को लेकर सरकार से सवाल पूछे गए। इन मुद्दों पर लगाए गए आरोपों और राजनीतिक व्याख्याओं की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।

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