क्या कोई व्यक्ति पंचायत चुनाव के लिए जिंदा और लोकसभा-विधानसभा चुनाव के लिए मृत हो सकता है? राजस्थान से सामने आई एक रिपोर्ट ने चुनाव आयोग की मतदाता सूची और SIR की पूरी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने जिन लोगों को मृत बताकर वोटर लिस्ट से हटा दिया, उनमें से 1,82,440 लोगों के नाम पंचायत चुनाव की मतदाता सूची में मौजूद मिले। यानी एक ही राज्य में एक व्यक्ति को लेकर दो सरकारी चुनावी सूचियों में दो अलग-अलग तस्वीरें हैं। एक में वह मृत है, दूसरी में वोट देने का हकदार।
यह खुलासा The Reporters' Collective की एक जांच में हुआ है। सवाल सिर्फ राजस्थान के 1.82 लाख मतदाताओं का नहीं है। सवाल यह है कि जिस SIR का मकसद मतदाता सूची को सही करना बताया जा रहा है, उसी प्रक्रिया में इतनी बड़ी संख्या में गड़बड़ियां कैसे सामने आ रही हैं?
8.75 लाख को मृत बताया, 1.82 लाख के नाम दूसरी सूची में मिले
राजस्थान में अक्टूबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच ECI ने SIR कराया। इस दौरान करीब 32.31 लाख मतदाताओं के नाम नेट तौर पर हटाए गए, जिनमें लगभग 8.75 लाख लोगों को मृत बताया गया था।
दूसरी तरफ, राजस्थान राज्य निर्वाचन आयोग (SEC) ने पंचायत चुनाव के लिए अपनी अलग मतदाता सूची तैयार की। जब The Reporters' Collective ने ECI की ASDD (Absent, Shifted, Dead and Duplicate) सूची का पंचायत मतदाता सूची से मिलान किया, तो 1,82,440 ऐसे लोग मिले जिन्हें ECI ने मृत बताया था, लेकिन पंचायत की वोटर लिस्ट में उनके नाम मौजूद थे।
यहां समझना जरूरी है कि ECI लोकसभा और विधानसभा चुनावों की मतदाता सूची संभालता है, जबकि पंचायत और नगर निकाय चुनावों की जिम्मेदारी राज्य निर्वाचन आयोग की होती है। दोनों की मतदाता सूचियां अलग-अलग हैं। लेकिन एक ही व्यक्ति की पहचान और उसकी स्थिति को लेकर इतना बड़ा अंतर होना गंभीर सवाल खड़ा करता है।
एक साथ पुनरीक्षण, फिर इतनी बड़ी चूक कैसे?
इस मामले की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि दोनों आयोगों ने लगभग एक ही समय पर मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण किया था। ECI ने 21 फरवरी 2026 को SIR पूरा किया, जबकि राजस्थान SEC ने चार दिन बाद यानी 25 फरवरी को पंचायत मतदाता सूची का पुनरीक्षण पूरा कर लिया। जब दोनों सूचियों को अपडेट करने की प्रक्रिया लगभग एक साथ चल रही थी, तो 1.82 लाख लोगों की स्थिति अलग-अलग कैसे हो गई? क्या दोनों आयोगों के बीच मतदाताओं की जानकारी साझा करने की व्यवस्था नहीं है? क्या मृत घोषित करने से पहले पर्याप्त जांच नहीं हुई? या फिर सत्यापन की प्रक्रिया में ही कोई बड़ी कमी है?
ये सवाल इसलिए भी जरूरी हैं क्योंकि रिपोर्ट के मुताबिक, पंचायत की मतदाता सूची का ड्राफ्ट ECI की ओर से लोगों को मृत, अनुपस्थित, स्थानांतरित या डुप्लीकेट बताकर हटाए जाने के बाद प्रकाशित हुआ था। इसके बावजूद इतनी बड़ी संख्या में नाम पंचायत सूची में मौजूद रहे।
गढ़ी में सबसे ज्यादा 4,889 ऐसे मतदाता
रिपोर्ट के मुताबिक, गढ़ी विधानसभा क्षेत्र में सबसे ज्यादा 4,889 ऐसे मतदाता मिले, जिन्हें ECI ने मृत बताया था, लेकिन पंचायत की वोटर लिस्ट में उनका नाम दर्ज था। सिरोही में यह संख्या 4,624 थी। रिपोर्ट में अजमेर के किशनगढ़ की 26 वर्षीय शालू डोलिया का उदाहरण भी दिया गया है। ECI की ASDD सूची में उन्हें मृत बताया गया, जबकि पंचायत की मतदाता सूची में उनका नाम मौजूद था। अब सोचिए, अगर कोई व्यक्ति जीवित है और उसका नाम एक चुनाव की सूची में मौजूद है, लेकिन दूसरे चुनाव की सूची से उसे मृत बताकर हटा दिया गया है, तो वह अपने सांसद और विधायक को कैसे चुनेगा? क्या उसे अपना वोट वापस पाने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ेंगे?
क्या किसी नागरिक का वोट देने का अधिकार इस बात पर निर्भर करेगा कि वह किस चुनाव की मतदाता सूची में दर्ज है?
BLO ने गड़बड़ी से इनकार किया, आयोगों ने जवाब नहीं दिया
रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने इस मामले में तीन बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) से संपर्क किया। इनमें से एक ने बात नहीं की, जबकि दो BLOs ने ऐसी गड़बड़ी होने से इनकार किया। लेकिन दोनों मतदाता सूचियों के डेटा का मिलान इस दावे से अलग तस्वीर दिखाता है। रिपोर्ट के मुताबिक, ECI और राजस्थान राज्य निर्वाचन आयोग को भी इस विसंगति पर विस्तृत सवाल भेजे गए, लेकिन रिपोर्ट प्रकाशित होने तक दोनों आयोगों की ओर से कोई जवाब नहीं मिला।
एक और अहम बात यह है कि SIR पूरा होने के बाद ECI की मतदाता सूची में हर महीने कुछ बदलाव किए गए। लेकिन आयोग यह स्पष्ट नहीं करता कि जिन लोगों को पहले मृत बताकर हटाया गया और बाद में जीवित पाया गया, उनके नाम और वोटर ID किस तरह बहाल किए जाते हैं। यानी गलती होने पर उसे सुधारने की व्यवस्था कितनी पारदर्शी है, यह भी साफ नहीं है।
राजस्थान से बाहर भी उठ रहे हैं SIR पर सवाल
SIR को लेकर सवाल सिर्फ राजस्थान में नहीं उठे हैं। पश्चिम बंगाल में लाखों नाम हटाए जाने और उसके बाद अपीलों की प्रक्रिया को लेकर विवाद सामने आए। कर्नाटक में अधिकारियों द्वारा हजारों Form-7 आवेदन दाखिल किए जाने का मामला भी चर्चा में रहा। अलग-अलग राज्यों में सामने आए इन मामलों की परिस्थितियां अलग हैं, लेकिन एक साझा सवाल जरूर है- मतदाता सूची से नाम हटाने और उनकी जांच करने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और भरोसेमंद है? राजस्थान का मामला इस बहस को और गंभीर बनाता है। यहां सवाल सिर्फ नाम कटने का नहीं, बल्कि एक ही व्यक्ति को एक सरकारी चुनावी रिकॉर्ड में मृत और दूसरे में मतदान के योग्य दिखाने का है। अगर ऐसी विसंगतियां सामने आ रही हैं, तो क्या चुनाव आयोग दूसरे राज्यों की मतदाता सूचियों की भी ऐसी जांच कराएगा?
आखिर जिम्मेदारी किसकी है?
यहां एक जरूरी बात भी है। The Reporters' Collective ने सभी 1,82,440 लोगों का घर-घर जाकर सत्यापन नहीं किया। उसने ECI और SEC के डेटा का मिलान किया और EPIC नंबरों के जरिए एक अलग राज्य आयोग पोर्टल पर कुछ मामलों की दोबारा जांच भी की। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि सभी 1.82 लाख लोगों के जीवित होने की स्वतंत्र रूप से पुष्टि हो चुकी है। लेकिन दोनों सरकारी सूचियों के बीच सामने आया यह अंतर अपने आप में जांच की मांग करता है। चुनाव आयोग को बताना चाहिए कि किसी व्यक्ति को मृत घोषित करने से पहले क्या जांच की जाती है? इतनी बड़ी संख्या में दोनों सूचियों के बीच अंतर क्यों है? क्या इन मामलों की दोबारा जांच होगी? और अगर किसी जीवित मतदाता का नाम गलत तरीके से काट दिया गया है, तो उसे बिना परेशानी अपना वोट देने का अधिकार कैसे वापस मिलेगा?
SIR का मकसद मतदाता सूची को साफ करना है, न कि किसी जीवित नागरिक को सरकारी रिकॉर्ड में मृत बनाकर उसका वोट छीन लेना। लोकतंत्र में वोटर लिस्ट सिर्फ नामों का दस्तावेज नहीं, बल्कि नागरिक के अधिकार की पहचान है। अगर इसी सूची में गड़बड़ी हो, तो चुनाव की निष्पक्षता और पूरी प्रक्रिया पर भरोसा कैसे कायम रहेगा? चुनाव आयोग को इन सवालों का जवाब देना ही होगा।





