केजरीवाल का यह बयान दिल्ली विधानसभा चुनाव के मद्देनजर राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस बयान पर कांग्रेस ने तुरंत प्रतिक्रिया दी और अरविंद केजरीवाल को 11 साल पुरानी घटना की याद दिलाई, जिससे उनके दावों की सच्चाई पर सवाल खड़ा किया। दिल्ली कांग्रेस के अध्यक्ष देवेंद्र यादव ने सवाल उठाया कि जब 2014 में जाटों को ओबीसी का दर्जा दिए जाने को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी, तब अरविंद केजरीवाल कहां थे? उन्होंने कहा कि उस समय केंद्र में एनडीए सरकार थी, और जाट समुदाय को ओबीसी सूची से बाहर कर दिया गया था, क्योंकि केंद्र सरकार ने इस मामले को सही तरीके से आगे नहीं बढ़ाया और इसे प्रभावी रूप से निपटाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया।
देवेंद्र यादव ने यह भी कहा कि दिल्ली की ओबीसी सूची में शीला दीक्षित के कार्यकाल में जाट समुदाय को शामिल किया गया था। यूपीए की दूसरी सरकार ने 7 राज्यों में जाट समुदाय को ओबीसी का दर्जा दिया था। लेकिन जब 2014 में मामला सुप्रीम कोर्ट में गया, तब केंद्र में एनडीए सरकार थी, और उसने इस मामले को पर्याप्त गंभीरता से नहीं लिया, जिसके परिणामस्वरूप जाटों को ओबीसी सूची से बाहर कर दिया गया। इसके साथ ही देवेंद्र यादव ने यह भी सवाल किया कि जब दिल्ली सरकार के पर्यावरण विभाग में इंजीनियरों के लिए कुछ वेकेंसी थीं, तो जाट समुदाय के लिए क्यों नहीं विचार किया गया? क्या जाट समुदाय को इन अवसरों का फायदा नहीं मिल सकता था?
उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले 10 वर्षों में दिल्ली सरकार ने ओबीसी समुदाय के हितों के लिए कोई नई योजना नहीं बनाई, जो उनके कल्याण को बढ़ावा दे सके।
यादव ने यह भी कहा कि दिल्ली सरकार ने बच्चों को स्कॉलरशिप देने के लिए कोई योजना नहीं बनाई और ना ही ओबीसी समुदाय को किसी अन्य प्रकार का लाभ देने के लिए कोई ठोस कदम उठाया। उनके मुताबिक, अगर केजरीवाल सच में जाट समुदाय के हक के लिए आवाज उठा रहे हैं, तो उन्हें पहले अपनी पार्टी और दिल्ली सरकार की तरफ से इस समुदाय के लिए किए गए वादों का पालन करना चाहिए।
Read This Also:- UP: कांग्रेस नेता डॉ. मेराजुद्दीन अहमद का निधन, उत्तर प्रदेश की राजनीति में शोक की लहर
Read This Also:- UP: कांग्रेस नेता डॉ. मेराजुद्दीन अहमद का निधन, उत्तर प्रदेश की राजनीति में शोक की लहर





