कम्युनिस्ट पार्टी में पहली बार दलित महासचिव बनने का मतलब
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कम्युनिस्ट पार्टी में पहली बार दलित महासचिव बनने का मतलब

By ThePrint(Hindi) calender  23-Aug-2019

कम्युनिस्ट पार्टी में पहली बार दलित महासचिव बनने का मतलब

क़ुर्बान अली: भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के लगभग सौ वर्षों (1920-1999) के इतिहास में पहली बार उसे एक दलित महासचिव मिला. पिछले दिनों डी. राजा सीपीआई के महासचिव बनाये गए. इसे महज़ एक हसीं इत्तेफ़ाक़ कहा जाये या विचित्र संयोग या कुछ और कि समाजवाद, सर्वहारा का अधिनायकवाद, लोकतंत्र, संविधान और सामाजिक न्याय का जाप करने वाली वामपंथी कम्युनिस्ट कम्युनिस्ट पार्टियों और ‘पिछड़े पावें सौ में साठ’ का नारा लगाने वाली सोशलिस्ट पार्टियों का प्रमुख (अध्यक्ष अथवा महासचिव) कोई दलित, आदिवासी, महिला या मुसलमान नहीं हो सका. इस मायने में सीपीआई द्वारा अपने नेता के तौर पर एक दलित को चुनना एक ऐतिहासिक घटना है.
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी यानी सीपीआई अपनी स्थापना का वर्ष 1925 बताती है, जब कानपुर में 26-28, दिसम्बर, 1925 को पार्टी का स्थापना सम्मेलन आयोजित किया गया था. लेकिन मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी यानी सीपीआई(एम) 17 अक्टूबर 1920 को अपना स्थापना वर्ष बताती है, जब एम.एन. रॉय और उनके कुछ साथियों ने ताशकंद में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की थी.
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इस प्रकार हम देखते हैं कि 1925 से लेकर 1964 तक, जब सीपीआई में पहला विभाजन हुआ और दो कम्युनिस्ट पार्टियां बन गयीं और तब से लेकर जुलाई 2019 तक दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों का महासचिव कोई दलित, आदिवासी, महिला या मुसलमान नहीं हो सका. 1969 में जब सीपीएम में विभाजन हुआ और सीपीआई (एम-एल) का गठन हुआ तो उसके शिखर पर भी कभी कोई दलित-आदिवासी-पिछड़ा नहीं रहा.
एक और हसीं इत्तेफ़ाक़ या विचित्र संयोग ये भी है कि सीपीआई और सीपीआई(एम) के अधिकतर महासचिव ब्राह्मण ही रहे. सीपीआई के जो लोग पार्टी महासचिव बने या बनाये गए उनमें एस.वी. घाटे, पी.सी. जोशी, बी.टी. रणदिवे, अजय घोष, श्रीपाद अमृत डांगे, ईएमएस नंबूदरीपाद, सी राजेश्वर राव, इंद्रजीत गुप्त, ए.बी. बर्धन, और सुधाकर रेड्डी के नाम उल्लेखनीय हैं. 1964 में सीपीआई में हुए विभाजन के बाद जब सीपीआई(एम) का गठन किया गया तो ये इत्तेफ़ाक़ या विचित्र संयोग सीपीआई(एम) के महासचिवों को चुनते हुए भी हुआ.
1964 से आज तक सीपीआई(एम) के जितने महासचिव चुने गए या बनाये गए उनमें पी. सुंदरैया, ईएमएस नम्बूदरीपाद, हरकिशन सिंह सुरजीत, प्रकाश कारात और सीताराम येचुरी में से सिर्फ़ हरकिशन सिंह सुरजीत को छोड़कर सभी महासचिव ब्राह्मण या सवर्ण ही रहे.
सोशलिस्ट आंदोलन के शिखर पर सामाजिक न्याय का अभाव
अब बात सामाजिक न्याय का दम्भ भरने और हर वक़्त ‘पिछड़े पावें सौ मैं साठ’ का नारा लगाने वाली सोशलिस्ट पार्टियों के नेतृत्व की भी हो जाये. 1934 में कांग्रेस पार्टी के भीतर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना करने वाले संस्थापक सदस्य थे – आचार्य नरेंद्र देव, सम्पूर्णानन्द, जयप्रकाश नारायण, मीनू मसानी, अच्युत पटवर्धन, राममनोहर लोहिया, अशोक मेहता, एस.एम. जोशी और एन.जी. गोरे. इनमें मीनू मसानी को छोड़कर सभी ऊंची जाति के हिंदू थे.
1934 से लेकर 1950 तक यानी कांग्रेस पार्टी में रहने और उससे बाहर निकलने के दो वर्षों बाद तक जब 1948 में सोशलिस्ट पार्टी का गठन किया गया था, जयप्रकाश नारायण लगभग 16 वर्षों तक लगातार पार्टी के प्रमुख यानि महासचिव बने रहे. मार्च 1950 से लेकर सितम्बर 1952 आचार्य नरेंद्र देव पार्टी अध्यक्ष और अशोक मेहता महासचिव हुए.
सितम्बर 1952 में सोशलिस्ट पार्टी और किसान मज़दूर प्रजा पार्टी का विलय होने के बाद जब प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का गठन हुआ तो आचार्य जे.बी. कृपलानी पार्टी अध्यक्ष और अशोक मेहता, और एन.जी. गोरे और बाद में कृपलानी के साथ राममनोहर लोहिया पार्टी महासचिव बनाए. 1954-55 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी में विभाजन हो गया और 1956 में राममनोहर लोहिया ने अपनी अलग सोशलिस्ट पार्टी बना ली.
तब से लेकर 1977 तक जब दोनों-तीनों सोशलिस्ट पार्टियों (बीच में कुछ अरसे के लिए प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और सोशलिस्ट पार्टी को मिलकर संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का गठन किया गया) का जनता पार्टी में विलय होने तक यानी 43 वर्षों की अवधि के दौरान दलित, आदिवासी, महिला और मुसलमानों के हितैषी और हिमायती होने का दावा करने वाले महान समाजवादी और सेक्युलर नेता जैसे आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण और राममनोहर लोहिया अपनी पार्टी का अध्यक्ष किसी दलित, पिछड़े, आदिवासी, महिला या मुसलमान को नहीं बना सके. अलबत्ता बिहार और उत्तर प्रदेश में चुनाव जीतने के मक़सद से दो एक बार (एक-दो साल के लिए) भूपेंद्र नारायण मंडल, कर्पूरी ठाकुर और रामसेवक यादव जैसे पिछड़ी जातियों के लोग जरूर सोशलिस्ट पार्टी और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के अध्यक्ष और महासचिव बनाए गए.
कम्युनिस्ट पार्टियों में हरकिशन सिंह सुरजीत और सोशलिस्ट पार्टियों में जॉर्ज फर्नांडीज़ को छोड़कर अल्पसंख्यक समुदाय का कोई व्यक्ति कभी भी पार्टी के सर्वोच्च पद तक नहीं पहुंच सका. वामपंथी और समाजवादी दल, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और भारतीय जनसंघ/भारतीय जनता पार्टी जैसे राष्ट्रीय दलों पर दशकों तक यह आरोप लगाते रहे की ये दल सवर्णों और अगड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व करते हैं और इन दलों में दलित, आदिवासी, महिला या मुसलमानों के लिए कोई स्थान नहीं है. हमने यह भी सुना कि वामपंथी दलों में पी.सी. जोशी, बी.टी. रणदिवे, अजय घोष, श्रीपद अमृत डांगे,पी. सुंदरैया, ईएमएस नम्बूदरीपाद, सी. राजेश्वर राव, इंद्रजीत गुप्त और ए.बी. बर्धन से बड़ा दलित कोई हो नहीं सकता.
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यही तर्क समाजवादी नेताओं अशोक मेहता, एस.एम. जोशी, गंगाशरण सिन्हा, एन.जी. गोरे, नाथ पाई, मधु दंडवते तथा राजनारायण, मधु लिमये, मामा बालेश्वर दयाल, रवि राय और किशन पटनायक जैसे नेताओं के बारे में भी दिया जाता रहा है कि वह दलितों से भी बड़े दलित थे, लेकिन जब हिस्सेदारी और भागीदारी देने का सवाल आया तो इतिहास गवाह है कि दलितों के साथ-साथ आदिवासियों, महिलाओं और मुसलमानों सहित दूसरे अल्पसंख्यकों की भी अनदेखी की गई और सरकार, संसद या विधानसभाओं में उन्हें प्रतिनिधित्व देना तो दूर की बात, उन्हें अपने दलों में भी समुचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया और सोशलिस्टों का ‘पिछड़े पावें सौ मैं साठ’ का नारा थोथा ही साबित हुआ.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सास-बहु के हवाले से एक कहावत कही जाती है जिसमें सास बहु से कहती है ‘कोठी-कुठले से हाथ मत लगाईयो, बाक़ी घर बार सब तेरा ही है.’ इसी तरह सोशलिस्ट और कम्युनिस्ट पार्टियों के समर्थक और वोटर किसी और समुदायों से रहे और नेतृत्व किसी और समुदाय से आता रहा.
सीपीआई ने इस परंपरा को तोड़ा है. देखना होगा कि ये एक दिखावा साबित होता है या यह किसी नई परंपरा की शुरुआत है.

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