आखिर क्यों इतना महत्वपूर्ण है संत रविदास मंदिर
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आखिर क्यों इतना महत्वपूर्ण है संत रविदास मंदिर

By ThePrint(Hindi) calender  22-Aug-2019

आखिर क्यों इतना महत्वपूर्ण है संत रविदास मंदिर

तल्ख आवाज़ में संत रविदास जयंती समिति समारोह के अमृतपाल सिंह पूछते हैं कि संत रविदास का मंदिर आखिर क्यों गिराया गया. वे पूछते हैं कि क्या, ‘राम मंदिर को कोई शिफ्ट करना चाहेगा क्या? यूपी सरकार के पास ज़मीन की कमी है क्या? वो जहां मर्ज़ी चाहे मंदिर बनवा सकते हैं लेकिन वहीं क्यों बनवा रहे हैं?’ उनके और उन जैसे कई लोगों के सवालों से साफ है कि दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) द्वारा तुगलकाबाद स्थित दलितों के पूजनीय संत रविदास का मंदिर गिराए जाने से उनका अनुसरण करने वालों में काफी रोष है.
भीम आर्मी के मुखिया चंद्रशेखर ने दिप्रिंट से बातचीत करते हुए कहा, ‘संत रविदास जी दलित समाज की आस्था का सवाल है. संत रविदास का मंदिर गिराया जाना 25 करोड़ लोगों की जनभावना का अपमान है. अगर सरकार ने हमारी मांग नहीं मानी तो हम लगातार आंदोलन करेंगे.’
मायावती और कांशीराम की जीवनी लिखने वाले समाज वैज्ञानिक बद्री नारायण कहते हैं, ‘दलित समाज के जाटव और चमार समुदाय से आने वाले लोगों के लिए रविदास सबसे पूजनीय. वो इस बात को लेकर दुखी हैं कि उनके भगवान का निवास छीन लिया गया.
वो आगे कहते हैं, पंजाब और उत्तर भारत में फैले दलितों में तीन पंथ या संप्रदाय हैं जो लोकप्रिय हैं- रविदासी, कबीरपंथी और शिवनारायण और उत्तर भारत में दलितों के लिए भगवान का मतलब रविदास है. उन तक राम तक पहुंचने का रास्ता रविदास से होकर जाता है.’
क्या है मामला
सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के बाद डीडीए ने 10 अगस्त 2019 को इस मंदिर को गिरा दिया. जिस जगह मंदिर था वो चारों तरफ से डीडीए की बाउंड्री से घिरा है. बाउंड्री के बीच से मंदिर तक जाने का एक रास्ता था जिसे सीमेंट और ईंट की दीवार से सील कर दिया गया है. नई दीवार को हर तरफ से पुलिस बैरिकेड से घेर दिया गया है और पुलिस ने मोर्चा संभाल लिया है.
मंदिर समिति का दावा है कि डीडीए ने जब मंदिर गिराया तो वहां से 1905 की ईंटें निकलीं. इस परिसर में 1930, 1959 और 1986 की तीन समाधियां भी थीं, वह भी इसी पंथ से जुड़े हुए थे, जिन्हें हटा दिया गया.
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अमृतपाल बताते हैं, ‘ भारत के दलित उप प्रधानमंत्री बाबू जगजीवन राम ने 1959 में मंदिर का पुर्नउद्धार कर फिर से उद्घाटन किया था.’ कोर्ट के दस्तावेजों के मुताबिक तुगलकाबाद में मौजूद इस परिसर में 12,350 स्क्वॉयर यार्ड का है जिसमें 20 कमरे और एक हॉल भी था, जिसे भी तोड़ दिया गया है.
डीडीए ने 1992 में भी मंदिर गिराने का प्रयास किया था तब समुदाय को लोगों ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था.
दिप्रिंट से बात करते हुए पूर्व सांसद उदित राज ने कहा, ‘देश में कई अवैध मंदिर हैं लेकिन उन्हें नहीं ढहाया गया है. ये मंदिर तो वहां आज़ादी के पहले से था और 1959 में बाबू जगजीवन राम ने इसका फिर से उदघाटन किया था. इन सबके बावजूद मंदिर गिराकर संत रविदास का अपमान किया गया. इसकी वजह से कोर्ट और मोदी सरकार के ख़िलाफ़ दलित समाज में काफी रोष है.’
‘510 साल पहले सिकंदर लोदी ने दी थी मंदिर के लिए ज़मीन’
तुगलकाबाद के जिस इलाके में मंदिर गिराया गया उससे कुछ ही दूरी पर संत रविदास का एक और मंदिर है. इस मंदिर परिसर में मौजूद संत के अनुयायी सतविंदर सिंह ने बताया, ‘510 साल पहले सिकंदर लोदी ने गुरू महाराज (संत रविदास) को मंदिर के लिए ज़मीन दान में दी थी.’
मंदिर गिराए जाने के दौरान सतविंदर वहीं मौजूद थे. पुलिस ने उन्हें और उनके एक और साथी को गिरफ्तार कर लिया था.
सिंह का दावा है कि रेवेन्यू रिकॉर्ड में ज़मीन मंदिर की है. वो कहते हैं, ’15वीं शताब्दी में संत रविदास इस जगह पर तीन दिनों के लिए आए थे और प्रवचन दिया था. उनके प्रवचन से प्रभावित होकर लोदी ने उन्हें ये ज़मीन दी थी.
ऑल इंडिया आदि धर्म मिशन देशभर में संत रविदास से जुड़ी धार्मिक जगहों की खोज और पहले से मौजूद मंदिरों की देख-रेख करता है. मिशन के मुताबिक संत रविदास ने अपने जीवनकाल में हज़ारों किलोमीटर की यात्रा की थी. इस दौरान जहां रात हो जाती वहां वो प्रवचन देते थे. प्रवचन से जुड़ी जो अहम जगहें हैं वहां उनके मंदिर बनाए गए हैं.
ऐसी कई अन्य जगहों की पहचान की जा रही है जहां उनके मंदिर बनाए जाने हैं. ऐसे ही 10 ठिकानों की पहचान की गई है जिनमें से एक झारखंड के लोटनिया में है. मिशन ने यहां मंदिर निर्माण के लिए ज़मीन ख़रीदी है.
मिशन के मुताबिक ढहाए गए मंदिर जितनी अहमियत रखने वाले करीब 10 अन्य मंदिर देशभर में मौजूद हैं. सिंह बताते हैं, ‘हालांकि संत रविदास का जन्म उत्तर प्रदेश में हुआ था, लेकिन पंजाब और दिल्ली के लोगों में बाकी राज्यों की तुलना में पंथ की बेहतर समझ है.’
भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग के मुताबिक ऐतिहासिक नहीं था मंदिर
इस मामले पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) के एक अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर बताया, ’15वीं शताब्दी से जुड़ा वहां कुछ होता तो हमें पता होता. वैसे भी ये मंदिर सांस्कृतिक धरोहरों में शामिल नहीं है.’
विभाग के ही एक और अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, ‘इसे लेकर एक आंतरिक सर्वे हुआ था. लेकिन सर्वे अतिक्रमण से जुड़ा था. इलाके में सिर्फ तुगलकाबाद फोर्ट ही एएसआई के ज़िम्मे है.’ आपको बता दें कि ट्रायल कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक के फैसलों में समिति लगातार मंदिर की ज़मीन गंवाती चली गई.
कौन थे संत रविदास 
मान्यताओं के आधार पर संत रविदास का जन्म वर्ष 1433 में बनारस में माघ पूर्णिमा के दिन हुआ था. इसलिए इस दिन को प्रत्येक वर्ष रविदास जयंती मनाई जाती है. उनको समाज में मौजूद आडंबरों को हटाने और जनसरोकार से जुड़े कामों के लिए याद किया जाता है. मान्यता है कि रविदास अपना जीवन यापन करने के लिए जूते बनाने का काम करते थे. समाज के निचले तबके के लोग उनके विचारों से काफी प्रेरित थे. वो उन्हें भगवान मानते थे. संत ने अपने उपदेशों के ज़रिए समाज में बराबरी का संदेश दिया.
मीराबाई भक्तिकालीन संत कवि रविदास को अपना गुरू मानती थीं. उनकी कुछ रचनाओं का संपादन सिखों के गुरू अर्जुन देव ने किया है जिन्हें गुरु ग्रंथ साहिब में स्थान दिया गया है. इसलिए रविदास मंदिर के गिराए जाने पर पंजाब में रोष देखा गया और दलित समाज के नेताओं ने ये मामला उठाया है.
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‘मंदिर पर हो रही राजनीति के पीछे नेताओं की जाति’
मंदिर के इर्द-गिर्द हो रही राजनीति पर मंदिर से जुड़े एक व्यक्ति ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा, ‘जो भी नेता मंदिर गिराए जाने का विरोध कर रहे हैं, कहीं न कहीं इसके पीछे का कारण उनकी जाति है.’ इसके लिए वो बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती और भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर की जाति का भी उल्लेख करते हैं.
यहां तक कि आम आदमी पार्टी से मिल रहे सर्मथन को लेकर भी कहा गया कि पार्टी में संत रविदास को मानने वाले दलित जाति के कई नेता हैं. ये भी बताया गया कि भाजपा और कांग्रेस भी मंदिर के समर्थन में हैं.
मंदिर गिराए जाने के पहले इन नेताओं ने कुछ क्यों नहीं किया जैसे सवाल के जवाब में बताया गया कि हालांकि ये मुद्दा लंबे समय से कोर्ट में था, लेकिन इन नेताओं को इसकी अहमियत का पता नहीं था.
अमृतपाल कहते हैं, ‘मंदिर में जब कोई कुष्ठ रोगी आता था तो वो संत रविदास जी के आशीर्वाद से ठीक हो जाता था.’ ऐसी मान्यताओं और भावनाओं से ओत-प्रोत लोग मंदिर उसी जगह पर फिर से बनाने की मांग को लेकर बुधवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक विरोध प्रदर्शन करने वाले हैं. इसी सिलसिले में ऑल इंडिया आदि धर्म मिशन के राष्ट्रीय प्रमुख संत सतविंदर सिंह भी पंजाब से दिल्ली आए हैं.
आगे की राह
अमृतपाल कहते हैं, ‘राम जन्मभूमि के मामले में मंदिर उसी जगह बनाने के पीछे इसलिए पड़े हुए हैं क्योंकि वहां राम जी का वास था. महत्व किस बात का होता है? महत्व इसी बात का होता है कि जिनका पवित्र स्थान जहां है लोग दर्शन के लिए वहीं जाते हैं.’ इसके लिए वो सारनाथ में बुद्ध और काशी में कबीर के मंदिर का उदाहरण भी देते हैं.
वो कहते हैं, ‘ये लोगों की आस्था का मामला है, वरना मंदिर तो कहीं भी दो-चार सौ गज़ ज़मीन लेकर बना सकते हैं. इसी वजह से देशभर के लोग बुधवार को जंतर-मंतर पर उसी जगह पर मंदिर की मांग को लेकर जुट रहे हैं.’

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