समाज नहीं पार्टी के लिए चिंतित हैं वंचित तबक़े के सांसद
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समाज नहीं पार्टी के लिए चिंतित हैं वंचित तबक़े के सांसद

By Satyahindi calender  21-Jul-2019

समाज नहीं पार्टी के लिए चिंतित हैं वंचित तबक़े के सांसद

कार्यपालिका, न्यायपालिका और निजी क्षेत्र में शीर्ष पदों पर नुमाइंदगी न होने के कारण समाज के दलित, पिछड़े तबक़े, महिलाओं और निःशक्त लोगों को हर मोर्चे पर शोषण का सामना करना पड़ रहा है। यह तबक़ा संसद में पहुँचे अपने समाज के नेताओं को बड़ी उम्मीद भरी नज़रों से देखता है। लेकिन ये नेता अपनी पार्टी लाइन के मुताबिक़ काम करने व शीर्ष नेतृत्व की प्रशंसा करने में जुटे हैं और वंचित समाज का नेतृत्व करने के लिए तैयार नहीं है।
हाल ही में एक सामाजिक संस्था “वी, द पीपल” की ओर से नई दिल्ली स्थित कांस्टीट्यूशन क्लब में उन सांसदों को एक कार्यक्रम में सम्मानित किया गया, जिनसे इस संस्था को सामाजिक न्याय की उम्मीद थी। संस्था ने सांसदों व मंत्रियों को अपनी तरफ़ से ज्ञापन भी सौंपा। संस्था की ओर से प्रमुख माँगें निम्नवत थीं -
1- संविधान लागू हुए 69 साल हो गए और और 1991 में मंडल कमीशन की सिफ़ारिशों के लागू होने के बाद भी अब तक पिछड़े वर्ग को प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया है। केंद्र सरकार की नौकरियों में पिछड़े वर्ग की हिस्सेदारी 6 प्रतिशत है।
2- समूह ग और घ की नौकरियों में नियुक्तियाँ न कर ठेके पर कर्मचारी रखे जा रहे हैं। इसमें किसी तरह का आरक्षण नहीं है और शीर्ष पदों पर बैठे सवर्ण अधिकारी सवर्ण लोगों को ही ठेके का काम दे रहे हैं। ठेके के कर्मचारी सवर्ण ही रखे जा रहे हैं।
3- विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों में संविदा पर सवर्णों की भर्ती हो रही है। सरकार अब संयुक्त सचिव, निदेशक, उप सचिव जैसे पदों पर लेटरल एंट्री के माध्यम से सवर्णों की भर्ती कर रही है, बहुजन समाज को कोई स्थान नहीं दिया जा रहा है।
4- विश्वविद्यालयों और डिग्री कॉलेजों में भर्ती के लिए ऐसी रोस्टर प्रणाली बनाई गई है कि ओबीसी, एससी, एसटी को निर्धारित आरक्षण नहीं मिल पा रहा है।
5 - 85 प्रतिशत बहुजन आबादी को 50 प्रतिशत आरक्षण में समेट दिया गया है। ओबीसी आरक्षण में क्रीमी लेयर लगाकर उन्हें जगह नहीं दी जा रही है।
इसके अलावा आयोजकों ने निजी क्षेत्र में वंचित तबक़े की हिस्सेदारी, ठेकों, पत्रकारिता सहित विभिन्न क्षेत्रों में हिस्सेदारी की भी बात सांसदों के सामने रखी। इस कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते, संतोष गंगवार, रामदास अठावले सहित दो दर्जन से ज़्यादा सांसद आए। उन्होंने अपने विचार रखे। सांसदों के विचार सुनकर निराशा होती है कि वे अपनी पार्टी लाइन से आगे बढ़ने का साहस नहीं कर पाते। जो समस्याएँ उनके सामने रखी जाती हैं, उस पर विचार करने, सरकार से उस पर बात करने के बजाय सरकार से जुड़े पार्टी सांसद यही जताने में लगे रहे कि सरकार बहुत अच्छा काम कर रही है। अभी जो गड़बड़ियाँ हैं, वह पिछली सरकार की वजह से हैं। सभी सांसदों की बातें सामने रखना संभव नहीं है, लेकिन वंचित तबक़ों की पैरोकारी करने वाले प्रमुख सांसदों की समीक्षा जरूरी हो जाती है, जिनसे समाज कुछ अपेक्षा करता है।
सबसे पहले सतना से तीसरी बार बीजेपी से सांसद चुने गए गणेश सिंह के भाषण पर चर्चा करते हैं। गणेश सिंह की चर्चा इसलिए ज़रूरी है क्योंकि सोलहवीं लोकसभा में अन्य पिछड़े वर्ग के कल्याण के लिए बनी समिति की अध्यक्षता उन्होंने की थी और हाल ही में समिति की 135 पेज की रिपोर्ट सामने आई है। 
इस रिपोर्ट को तैयार कराते समय स्वाभाविक रूप से गणेश सिंह ने आईएएस से लेकर ठेकों पर हो रही भर्तियों में धांधलियों व पिछड़े वर्ग के शोषण के गवाह रहे पीड़ितों से बात की है, जिसका जिक्र उन्होंने रिपोर्ट में किया है। स्वाभाविक है कि उन्हें यह जानकारी है कि वंचित तबक़ों के साथ किस तरह से भेदभाव किया जा रहा है।
गणेश सिंह ने अपने संबोधन में साफ़ कहा कि ओबीसी को आरक्षण राजनीतिक मजबूरियों के चलते मिल गया, इस वर्ग ने आरक्षण के लिए संघर्ष नहीं किया। ​​​​​​​हक़ीक़त देखें तो गणेश सिंह के समुदाय से ही आने वाले पंजाब राव देशमुख ने 1944 में ही अखिल भारतीय ओबीसी फ़ेडरेशन बना लिया था और आरक्षण दिया जाना इस संगठन की माँग रही थी। इसके अलावा ओबीसी आरक्षण के लिए लंबा संघर्ष चला है। 

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