राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद टीवी चैनलों ने वही रंग दिखाया जिसमें उन्हें महारथ हासिल है
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राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद टीवी चैनलों ने वही रंग दिखाया जिसमें उन्हें महारथ हासिल है

By Newslaundry calender  06-Jul-2019

राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद टीवी चैनलों ने वही रंग दिखाया जिसमें उन्हें महारथ हासिल है

राहुल गांधी ने औपचारिक रूप से इस्तीफा दे दिया और इस इस्तीफे ने हमारे टीवी चैनल स्टूडियो के योद्धाओं को उत्तेजित कर दिया. जहां एक तरफ अधिकांश कांग्रेसियों ने दुखी होकर विचार व्यक्त किये, जैसे कि किसी की मृत्यु हो गयी हो, और भारतीय जनता पार्टी के लोग उनके पत्र को लेकर नाराज़ थे, वहीं हमारे एंकरों की प्रतिक्रिया विचित्र थी, वे इस इस्तीफे को मान ही नहीं रहे थे.
वे पूछ रहे थे, "अगर राहुल नहीं, तो कौन?" टीवी चैनलों पर चल रही 'बहस' का निष्कर्ष मूल रूप से यह था कि "जब हम सब जानते हैं कि कांग्रेस गांधियों के बिना चल नहीं सकती तो यह इस्तीफे का नाटक क्यों?" मैंने उनमें से कुछ को देखा और ऐसा लगा जैसे लोगों का दिमाग फिर गया है.
इससे पहले कि हम समाचार चैनलों की बात करें, पहले बात करते हैं उदास कांग्रेसियों की और कुछ उदासीन भाजपाइयों की.
राजनेता
सलमान खुर्शीद ब्रह्मांड के सबसे उदास व्यक्ति लग रहे थे और उन्होंने गांधियों की प्रासंगिकता के बारे में बोलने की कोशिश की. उन्होंने कहा, “राहुल गांधी ने भले ही पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया हो, लेकिन वह हमारे नेता रहेंगे. सोनिया गांधी भी अब अध्यक्ष नहीं हैं, लेकिन अभी भी वे हमारी नेता हैं.” उनके अनुसार, यह क्रम प्राकृतिक है.
कर्नाटक कांग्रेस के नेता डीके शिवकुमार ने तो घोषणा तक कर दी, "गांधी परिवार के बिना कांग्रेस टूट जायेगी. मैं पूरी तरह से यह मानता हूं कि गांधी परिवार कांग्रेस को एकजुट करके रखता है और कांग्रेस भारत को एकजुट करती है." कितने उदार विचार हैं इनके.
पंजाब के सीएम अमरिंदर सिंह ने भी अपने विचार व्यक्त किये, “एक चुनावी हार से आप राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमताओं को परिभाषित नहीं कर सकते हैं. इस सामूहिक हार के लिए राहुल अगर खुद को जिम्मेदार ठहराते हैं तो यह उचित नहीं है."
भाजपा ने इस अवसर को यह दिखाने के लिए उपयोग किया कि दोनों पार्टियों में कितना अंतर है. मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि यह "सालों पुरानी पार्टी का नया ड्रामा'' है. गोरखपुर से सांसद रवि किशन ने कहा, "यह निर्णय बुद्धिमता भरा है और हो सकता है कि वे कांग्रेस पार्टी की हार के कारणों का आत्मनिरीक्षण करना चाहते हों."
केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने गर्व के साथ घोषणा की कि भाजपा चुनाव के लिए तैयार है. उन्होंने कहा, “भाजपा में चुनाव और सदस्यता समय सारिणी तैयार है. काम भी शुरू हो चुका है. हमारे पास एक कार्यकारी अध्यक्ष भी है. अगर दूसरी पार्टी में कुछ नहीं हो रहा है, तो उस में मैं क्या कर सकता हूं?"
टाइम्स नाउ
एक तरफ टाइम्स नाउ ने सीधे-सीधे इस इस्तीफे को ''दिखावा'' घोषित कर दिया, वहीं इस पर मंथन भी किया कि क्या यह सही मायने में "दिखावा" था. जी हां, आपने सही सुना. उनके टिकर पर "राहुल का दिखावटी इस्तीफ़ा?“ (Rahul Sham Resignation) और हैशटैग “#RahulShamResignation” ही चलता रहा.
 
हमारे मीडिया वाचडॉग राहुल शिवशंकर उर्फ़ आरएसएस ने एक जगह पर मौखिक विराम चिन्हों से भरे एक वाक्य में व्यापक अवलोकन किया. उन्होंने कहा, "खुले तौर पर सोचिये, अगर आप एक कंपनी के बॉस हैं, आप उसकी विफलता की जिम्मेदारी लेते हैं, फिर आप इस्तीफ़ा दे देते हैं, तो क्या आप उस ग्रुप को, जो आपकी जी-हुज़ूरी करता है, अपना उत्तराधिकारी ढूंढने के लिए अधिकृत करेंगे? मैं इसे सिर्फ राज-त्याग कह रहा हूं, त्यागपत्र नहीं. राहुल अभी भी कांग्रेस के संरक्षक बने हुए हैं. देखने वाले और उनकी पार्टी के पदाधिकारी उन्हें अभी भी सर्वोच्च नेता मानते हैं."
आरएसएस और उनके दोस्तों को राहुल गांधी के पत्र के एक विशेष अंश से काफी समस्या है. उस पत्र में लिखा है:
"इस्तीफा देने के तुरंत बाद, मैंने कांग्रेस वर्किंग कमेटी (सीडब्ल्यूसी) में अपने सहयोगियों को सुझाव दिया कि इसके आगे की प्रक्रिया ऐसी हो, जिसमें कुछ लोगों को नया अध्यक्ष खोजने का काम सौंपा जाना चाहिए. मैंने ऐसा करने के लिए उन्हें अधिकृत किया है और इस प्रक्रिया में व इस परिवर्तन की प्रक्रिया में पूर्ण सहयोग करूंगा."
टाइम्स नाउ ने इस खास पैराग्राफ के कुछ हिस्सों को विशेष रूप से उभार कर और ग्राफ़िक्स के द्वारा दिखाया. ज़ाहिर है, उन्होंने पत्र के उस हिस्से पर जिसमें लिखा था "मैंने उन्हें ऐसा करने के लिए अधिकृत किया है" को बार-बार दिखाया और इस इस्तीफे को एक दिखावा बताया.
 
आरएसएस ने बेहद गंभीरता से पूछा, "क्या राहुल गांधी ने खुद को सर्वोच्च कमांडर घोषित किया है, ताकि वह रिमोट से सरकार चला सकें." एक मिनट, सरकार चला सकें? इन दिनों बहस में किस समानांतर ब्रह्मांड को लाया जा रहा है? पिछली बार जब मैंने सुना था, हमारे प्रधानमंत्री, कर्ता-धर्ता और स्वयं विष्णु के अवतार तो नरेंद्र मोदी थे.
बहस के दौरान एक जगह पर आरएसएस ने बेहद गंभीर मुद्रा में कैमरे की तरफ देखा और कहा, "मोतीलाल वोरा तो पहाड़ जितने पुराने हैं." पूरा पैनल इस बात पर हंसने लगा, लेकिन आरएसएस को इसमें बिलकुल भी हंसी नहीं आयी. 90 साल के वोरा की फोटो स्क्रीन पर दिखती है और वे कहते हैं, "नहीं, मैं गंभीर हूं. आप देखिये उन्हें," और पूरा पैनल खिलखिलाता रहा. "वे काफी अनुभवी हैं, उन्होंने जीवन में बहुत कुछ देखा है."
अगर चाहें, तो आरएसएस एक भावशून्य स्टैंड-अप कॉमेडियन के रूप में अच्छा काम कर सकते हैं. मैं वास्तव में यह उम्मीद करता हूं कि वो इस दिशा में कभी सोचेंगे.मैं उन्हें देखने के लिए पैसे देने को भी तैयार हूं.
रिपब्लिक टीवी
समाचार हैशटैग के इतिहास में रिपब्लिक ने सबसे सरल हैशटैग दिया, एक ऐसा हैशटैग जिस पर हम सभी गर्व कर सकते हैं: #RahulOut. सच में कितना शिष्ट था.
जैसे ही राहुल गांधी के इस्तीफे की खबर आयी, रिपब्लिक की टीम एवेंजर्स की तरह इकठ्ठा हुई होगी और कांग्रेस के लिए भविष्य की योजना तैयार कर रही होगी. अर्नब ने इकठ्ठा हुए लोगों से जोर से पूछा होगा, "अगर राहुल नहीं तो कौन है? बताओ मुझे! कौन? अब क्या होगा? हमें कांग्रेस को बताना चाहिए कि आगे क्या करना है! मुझे कुछ ऐसे ग्राफ़िक्स बना कर दो जो कि 'प्लान बी' के बारे में बताता हो."
आप लोग सोच रहे होंगे कि यह मेरी अतिशयोक्ति से भरी हुई कल्पना है, लेकिन शायद मैं कल्पना के मामले में रिपब्लिक टीवी को मात नहीं दे सकता हूं.
 
रिपब्लिक के अनुसार, कांग्रेस का प्लान बी कुछ ऐसा है:
पहला चरण: एक वर्ष के लिए स्टॉप-गैप अंतरिम अध्यक्ष नियुक्त करें
दूसरा चरण: गांधी-वाड्रा परिवार के सदस्य को नियुक्त करें
तीसरा चरण: प्रियंका गांधी प्रधानमंत्री बन जायें
चौथा चरण:...
पांचवा चरण: लाभ!!!
रिपब्लिक के सूत्रों ने कहा कि इस्तीफे की आड़ में यह "सब नाटक" है. अर्नब ने मोतीलाल वोरा के ग्राफिक की तरफ इशारा करते हुए पुछा, “यह आदमी 90 साल का है. क्या नये भारत के लिए कांग्रेस यही विचार करती है? यही है उनका 'युवा' भारत?” ज़ाहिर है, इसके बाद पैनल हंसने लगता है.
एक जांबाज़ पैनलिस्ट ने बहस को फिर से राहुल पर केंद्रित किया और बताया कि उन्होंने इस्तीफा दे दिया है, "हम उनके बारे में इतनी बात क्यों कर रहे हैं? जब उन्होंने अपने फैसले ले लिए हैं?" अर्नब इन सब को अनसुना कर देते हैं, ज़ाहिर है, क्योंकि यह सब नाटक है- सूत्रों के अनुसार. वे सोच रहे हैं, "क्या उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया है? आपको पता है कांग्रेस में कैसे काम होता है. अपने त्यागपत्र में उन्होंने लोगों को दोषी ठहराया है." व्यंगात्मक लहजे में उन्होंने कहा, "ये सिर्फ आत्म-प्रशंसा से भरी हुई गाथा है. अपनी चिट्ठी में राहुल ने कहा: 'आप लोग बहुत बुरे हो. मैं बहुत अच्छा हूं. मैं हीरो हूं, मोदी जी खलनायक है.' आप जानते हैं कि वह क्या हैं? वे सिर्फ निराश, स्वयं-सेवा से भरपूर, भ्रमित करने वाले व्यक्ति हैं."
उसके बाद स्टूडियो में बिलकुल शांत माहौल हो गया.
पूरी "बहस" के दौरान अर्नब का लक्ष्य सिर्फ इतना था कि किसी तरह से अपने पैनलिस्टों से यह कहलवाएं कि राहुल गांधी का लिखा हुआ पत्र कितना शर्मनाक है. मतलब था कि राहुल गांधी की हिम्मत कैसे हुई यह सुझाव देने की कि इस देश की संस्थानें काम नहीं कर रही हैं? उनकी हिम्मत कैसे हुई नरेंद्र मोदी पर जनादेश चुराने का आरोप लगाने की? वे अपने आपको समझते क्या हैं? जबकि ख़ुद एक हारे हुए व्यक्ति हैं.
अर्नब खान मार्किट गैंग के बारे में भी काफी चिंतित थे. वे कहते हैं, "खान मार्किट गैंग गांधी-वाड्रा परिवार नामक पोंजी स्कीम में निवेशक था." अब खान मार्केट गैंग का क्या होगा?"
पूरे मामले सबसे मज़ेदार बात वह थी, जिसमें अर्नब और पैनेलिस्ट अस्तित्व संकट के ऊपर बात करने लगते हैं. एक पैनलिस्ट ने पूछा कि अब टेलीविज़न के ऐंकरों का क्या होगा, जिन्होंने अपने पसंदीदा इंसान को खो दिया." अर्नब ने पूछा, कौन पसंदीदा लड़का, उल्टा भाजपा को चिंतित होना चाहिए. इस बात पर भाजपा के पैनलिस्ट गौरव भाटिया बीच में कूद पड़े, "राहुल गांधी भाजपा की बहुत मदद करते हैं. मुझे अच्छा नहीं लग रहा है. उन्होंने हमारे लिए प्रचार किया है." फिर भाटिया बेतरतीब ढंग से एक गाना गाते हैं, "काटे नहीं कटते ये दिन ये रात, कहनी थी तुमसे दिल की बात, लो आज मैं कहता हूं... आई हेट यू. आई हेट यू.”
एनडीटीवी
एनडीटीवी की निधि राजदान ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अभिषेक मनु सिंघवी से बातचीत की, जो कि कह रहे थे, "हमें फिर से इकठ्ठा होना होगा. यह दुःखद है लेकिन अब हमें पुनर्निर्माण करना होगा."
निधि ने पूछा, "यह दुःखद क्यों है?" अब गांधी परिवार से आगे सोचने का समय है?"
काफी उदास दिख रहे सिंघवी ने जवाब दिया, "अभी तक मुझे ऐसा कोई नेता नहीं मिला, जिसमें राहुल गांधी की तुलना में सुधारवादी उत्साह ज़्यादा हो. उन्होंने हम सभी से ज़्यादा कड़ी मेहनत की है. उनकी कांग्रेस के पूर्ण पुनर्गठन की मांग एकदम जायज़ है. कोई भी कांग्रेसी जिसकी सोच सही होगी वो इसका विरोध नहीं करेगा. वो सबके लिए एक मिसाल पेश कर रहे हैं, उनका पत्र गद्य और कविता है से भरा हुआ है."
गद्य और कविता? अच्छा ठीक है फिर. यह बात आनंद रंगनाथन को बतायी जानी चाहिए, जो टाइम्स नाउ और रिपब्लिक दोनों चैनलों पर, यह घोषणा करते हुए नज़र आये, "यह पत्र किसी अराजकतावादी द्वारा लिखा गया है." लेकिन वह यह नहीं कर सकते. यह एनडीटीवी है जहां सबसे कम ड्रामा होता है.
निधि ने सिंघवी को थोड़ा और कुरेदा और पूछा, "क्या कांग्रेस के अंदर एक तबका ऐसा भी है, जिसे लगता है कि पूरा अभियान गलत चीज़ों पर केंद्रित रहा है?" जिसके जवाब में सिंघवी ने कहा, "नहीं, कुछ लोग थोड़ा असहमत थे, लेकिन 98 से 99 प्रतिशत लोगों ने पार्टी लाइन का अनुसरण किया."
मुझे आपका नहीं पता, लेकिन मैंने सिंघवी को बहुत उदास देखा. यहां पर उनका चेहरा नाउम्मीदी की दास्तान बयान कर रहा था.
ज़ी न्यूज़
हालांकि, इस उन्माद का विजेता साफ़ तौर पर ज़ी न्यूज़ रहा. उसके टिकर चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे थे, "क्या राहुल रिमोट से कांग्रेस चलायेंगे?", "ऐतिहासिक हार, लेकिन फिर भी जनादेश पर हमला?" और "राहुल की कमी: वे बहुत जल्दी हार मान जाते हैं?"
तथ्यों में बहुत ज़्यादा घुसने वाले सुधीर चौधरी ने सच में कुछ उत्कृष्ट सवाल पूछे: "क्या राहुल मोदी की जीत हज़म नहीं कर पा रहे हैं? क्या वे इस्तीफे का नाटक करके बहुमत के फैसले का अपमान कर रहे हैं?" ज़ाहिर है, वे पत्र के उन अंशों की ओर इशारा कर रहे थे, जिसमें राहुल गांधी ने भारत के विचार की रक्षा के लिए तत्पर रहने की बातें कहीं.
सुधीर ने अपने पिटारे से यह कटु निष्कर्ष निकालते हुए घोषणा कर दी, "कांग्रेस के सभी नेता राहुल का इस्तीफा चाहते हैं. लेकिन वे यह भी कहते हैं कि वे नहीं चाहते कि राहुल इस्तीफा दें. विपक्ष या कांग्रेस में से कोई भी यह नहीं समझ पा रहा है कि राहुल के इस्तीफे पर क्या प्रतिक्रिया दी जाये."
सुधीर भाजपा के लिए भी काफी चिंतित थे. "राहुल के इस्तीफे से भाजपा को सबसे ज़्यादा नुकसान होगा. आरजी के इस्तीफे के बाद, भाजपा के नेता भी कांग्रेस के लिए चिंतित हैं."
सुधीर के पास कांग्रेस के भावी नेता पर सबसे दिलचस्प आंकलन है. उन्होंने स्पष्ट रूप से बातचीत के बीच में मंदिर शब्द को लाने का अवसर जाने दिये बगैर आंकलन किया, "सीडब्लूसी सुशील शिंदे और गहलोत के नामों पर विचार कर रही है. रिमोट कंट्रोल गांधी परिवार के पास रहेगा. 10 जनपथ एक मंदिर की तरह बन जायेगा.
चिंतित सुधीर ने कहा, "जो भी अब नया नेता बनेगा उसे 10 जनपथ पर 'माथा टेकने' जाना होगा. राहुल गांधी को अब ज़्यादा मेहनत नहीं करनी होगी. वो दिल्ली में बैठ सकते हैं, वह विदेशों में छुट्टियां मनाने जा सकते हैं, अब उन्हें परेशान होने की ज़रूरत नहीं है और न ही गर्मी में घूमने की ज़रूरत है. अगर कांग्रेस जीतती है, तो गांधी परिवार को श्रेय मिलेगा. अगर हारती है, तो नये नेता के ऊपर ठीकरा फोड़ा जायेगा."
फिर सुधीर चौधरी ने कांग्रेस समर्थक 'डिज़ाइनर' पत्रकारों को कोसना शुरू किया, उस आदमी का मज़ाक उड़ाया जिसने खुद को राहुल गांधी के घर के सामने फांसी लगाने की कोशिश की, और दुखी सलमान खुर्शीद की फोटो दिखाते हुए एक टिकर चलाया जिस पर लिखा था: "अफ़ज़ल प्रेमी और टुकड़े टुकड़े गैंग आज बहुत दुःखी हैं!"
वाकई में, बेहतरीन आंकलन किया सुधीर जी आपने.
एक चीज़ बिलकुल साफ़ तौर पर सबके सामने थी, वो यह कि इनमें से किसी भी बहस में कांग्रेस के प्रतिनिधियों की अनुपस्थिति. "सहानुभूति रखने वाले" लोग तो थे, लेकिन उदास नेताओं के निराशाजनक बयानों के अलावा कोई वास्तविक प्रतिक्रिया नहीं थी. राहुल के इस्तीफे की कवरेज को सिर्फ एक फोटो से भी दिखाया जा सकता था, जो कि रिपब्लिक ने दिखायी भी थी

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