प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मालदीव जाकर क्या मिला?
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मालदीव जाकर क्या मिला?

By Bbc calender  10-Jun-2019

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मालदीव जाकर क्या मिला?

मालदीव के आलीशान प्रेसीडेंट्स हाउस के बैंक्वेट हॉल में शनिवार को कोई तीस लोग रहे होंगे. शाम के साढ़े पाँच बज रहे थे और इससे पहले बग़ल वाले प्राइवेट हॉल में मालदीव के राष्ट्रपति इब्राहिम सोलिह से भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लंबी बातचीत चली थी. मोदी ने उन्हें टीम इंडिया के ऑटोग्राफ़ वाला क्रिकेट बैट गिफ़्ट किया तो राष्ट्रपति सोलिह भारतीय पीएम को मालदीव के सर्वोच्च सम्मान 'निशान इज़्ज़ुदीन' से सम्मानित कर संयुक्त प्रेस वार्ता करने पहुँचे. मोदी इस मेडल को पहने हुए बग़ल के हॉल में पहुँचे.
शुरुआत राष्ट्रपति सोलिह ने की और जब मोदी की बारी आई तो उन्होंने पहले सोने के 'निशान इज़्ज़ुदीन' मेडल तो गले में ठीक करते हुए कहा, "हमारे देशों ने कुछ दिन पहले ही ईद का त्योहार हर्ष और उल्लास के साथ मनाया है. मेरी शुभकामनाएं हैं कि इस पर्व का प्रकाश हमारे नागरिकों के जीवन को हमेशा आलोकित करता रहे." मोदी के इस वाक्य पर उनके बाईं ओर खड़े भारतीय दल के लोग मुस्कुराए. सबसे ज़्यादा मुस्कराहट दिखी कैबिनेट मंत्री का दर्जा रखने वाले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के चेहरे पर.
यात्रा से क्या मिला?
माले में तीस साल से रह रहीं भारतीय मूल की व्यवसायी कंचन जशनानी से मामले पर बात हुई तो उन्होंने कहा, "पिछले सालों में यहाँ बदलाव तो बहुत आया है. कुछ चीज़ें अच्छी हुईं तो कुछ वैसी नहीं कहीं जा सकतीं. लेकिन इस यात्रा के बाद आगे अच्छा होना चाहिए ऐसी अभी उम्मीद तो है."
लेकिन वजह अनेक हैं जिन पर ख़ास ध्यान देने की ज़रूरत है. पहली बात ये कि दोबारा प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी के मालदीव को चुनने की असल वजह क्या है. मोदी ने अपने दूसरे शपथ ग्रहण समारोह में पिछली बार की तरह दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) के नहीं बल्कि बिम्सटेक देशों के समूह के नेताओं को बुलाया और मालदीव इसमें नहीं था. दूसरी बात ये कि पिछले कुछ सालों में मालदीव और श्रीलंका भारतीय विदेश नीति के लिए पाकिस्तान के बाद शायद सबसे बड़ी चुनौती रहे हैं.
दोनों देशों में एक लंबे समय तक प्रतिद्वंदी चीन की हिमायती सरकारें सत्ता में थीं और भारत को ये बात खटक रही थी. गोवा विश्विद्यालय में दक्षिण एशिया विभाग के प्रोफ़ेसर राहुल त्रिपाठी के मुताबिक़, "कुछ आलोचक इस बात को भी कहते रहे हैं कि भारत इंतज़ार कर रहा था, किसी भी मौक़े का, इन दोनों देशों में दोबारा पैर जमाने का. श्रीलंका में मौक़ा थोड़ा पहले मिला और मालदीव में थोड़ा बाद में. लेकिन गोल एक था, चीन को पछाड़ना."
ज़ाहिर है, मालदीव की इस यात्रा से भारत अंतरराष्ट्रीय समुदाय को एक संदेश भी देना चाहता है कि उसके अपने क़रीबी पड़ोसी उसके 'पाले में हैं.' प्रधानमंत्री मोदी के ही नेतृत्व वाली पिछली सरकार के दौरान नेपाल से सम्बन्धों में दरार आ गई थी जब 'आर्थिक ब्लॉकेड' का मसला हुआ था और उसके कुछ साल बाद नेपाल ने भारतीय नोटों पर बैन लगा दिया था.
 

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