साल बदले, सरकारें बदलीं, लेकिन यमुना नदी के हालात जस के तस बने हुए हैं। दिल्ली के कालिंदी कुंज घाट पर इस समय यमुना के पानी का रंग पूरी तरह काला पड़ चुका है और उस पर तैरता हुआ खतरनाक सफेद व मटमैला झाग इसकी दुर्दशा की गवाही दे रहा है। छठ पूजा के नजदीक आते ही एक बार फिर यमुना की सफाई और राजनीतिक दावों को लेकर बहस छिड़ गई है।
ग्राउंड जीरो पर स्थिति यह है कि लोग जब शुद्धिकरण या पिंडदान के लिए यहां पहुंचते हैं, तो उन्हें गटर जैसा अहसास होता है। स्थानीय गोताखोरों और निवासियों का कहना है कि वे पिछले 20-25 वर्षों से यमुना को इसी नरकीय स्थिति में देख रहे हैं। इस दूषित पानी और केमिकल वेस्ट के संपर्क में आने से गोताखोरों की आंखें खराब हो रही हैं और सांस की गंभीर बीमारियां पैदा हो रही हैं। इसके बावजूद हर साल केवल त्योहारों के समय खानापूर्ति की जाती है।
हकीकत यह है कि छठ पूजा जैसे महापर्व से ठीक पहले प्रशासनिक स्तर पर 'फेस सेविंग' की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। कालिंदी कुंज के पास टेंट लगाकर डिफॉमर केमिकल्स, मोटर, पाइप और सुरक्षा उपकरण भारी मात्रा में जमा किए जाते हैं। जैसे ही झाग बनना शुरू होता है, केमिकल का छिड़काव कर उस झाग को अस्थायी रूप से हटा दिया जाता है ताकि कैमरों में बदहाली की तस्वीरें कैद न हों और सरकार की किरकिरी न बचे। हालांकि, जानकारों का मानना है कि इन रसायनों से जलीय जीव-जंतुओं और नदी की बायोडायवर्सिटी को भारी नुकसान पहुंचता है।
राजनीतिक स्तर पर भी इस मुद्दे पर तीखा टकराव देखने को मिलता है। विपक्षी दल नेताओं के दावों पर सवाल उठा रहे हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि नेता आकर सिर्फ दावे करते हैं या पानी साफ दिखाने की कोशिश करते हैं, जबकि जमीनी हकीकत यह है कि वजीराबाद से लेकर कालिंदी कुंज तक दिल्ली के हिस्से में यमुना में लगभग 80 प्रतिशत प्रदूषण समाहित हो जाता है।
जनता का सवाल साफ है कि यदि नेता और सरकारें वास्तव में यमुना को संवारना चाहती हैं, तो केवल कागजी दावे और कैमरों के सामने औपचारिकताएं पूरी करने के बजाय नालों के ट्रीटमेंट और ठोस कचरा प्रबंधन पर स्थायी काम क्यों नहीं किया जाता? जब तक जमीनी स्तर पर कड़े कदम नहीं उठाए जाएंगे, तब तक हर साल करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था इसी तरह जहरीले झाग और मैल के बीच जूझती रहेगी।
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