सुप्रीम कोर्ट ने सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (CBSE) की त्रि-भाषा नीति (3-Language Policy) को मौजूदा सत्र से ही अचानक लागू करने पर सवाल उठाए हैं। शीर्ष अदालत ने सुझाव दिया है कि कक्षा 6 के छात्रों के लिए तीसरी भाषा के प्रावधान को अगले शैक्षणिक वर्ष से लागू किया जाना चाहिए, ताकि बच्चों को मानसिक रूप से ढलने और तैयारी करने का पर्याप्त समय मिल सके।
अदालत की मुख्य टिप्पणियां और CBSE का रुख
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मानसिक तैयारी का अवसर: मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने कहा कि अचानक नियम बदलने से छात्रों पर दबाव बनता है। अगले साल से लागू करने पर बच्चों को तैयारी का समय मिलेगा।
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स्वैच्छिक विकल्प की अनुमति: जस्टिस बागची ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि वर्तमान में कक्षा 6 में पढ़ रहे छात्र इसी सत्र से तीन भाषाएं पढ़ना चाहते हैं, तो उन्हें इसकी अनुमति दी जा सकती है।
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CBSE का रुख: बोर्ड की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को बताया कि CBSE सुप्रीम कोर्ट के इस सुझाव पर गंभीरता से विचार करेगा।
क्या हैं त्रि-भाषा नीति (3-Language Policy) के नए नियम?
नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (NEP) के तहत लागू की जा रही इस नीति के प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं:
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दो भारतीय भाषाएं अनिवार्य: सीबीएसई के सर्कुलर के अनुसार, विद्यार्थियों को अब तीन भाषाएं पढ़नी होंगी, जिनमें से कम से कम दो भारतीय भाषाएं होना अनिवार्य है।
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कक्षा 9 के लिए निर्देश: कक्षा 9 के प्रत्येक छात्र के लिए 1 जुलाई से तीन भाषाएं पढ़ना अनिवार्य किया गया है।
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भाषाओं का चयन:
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भारतीय भाषाएं: हिंदी, संस्कृत, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, मराठी, बंगाली, पंजाबी, गुजराती, ओडिया, असमिया आदि।
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विदेशी/गैर-भारतीय भाषाएं: अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, अरबी, स्पेनिश आदि।
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छूट का प्रावधान: कक्षा 6 के लिए दो भारतीय भाषाएं अनिवार्य हैं, जबकि कक्षा 7, 8 और 9 के उन छात्रों को राहत दी गई है जो पहले से दो गैर-भारतीय भाषाएं पढ़ रहे थे।
बता दें कि 27 मई को सुप्रीम कोर्ट ने इस नीति के खिलाफ दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, सीबीएसई और एनसीईआरटी (NCERT) को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था।





