पार्टी के अल्पसंख्यक विभाग के प्रदेश महासचिव मोहम्मद तबरेज़ सिद्दीकी 'अलीग' ने भी पार्टी अध्यक्ष नीतीश कुमार को इस्तीफा भेज दिया है। वहीं, इमारत-ए-शरिया के नाज़िम, मुफ्ती मोहम्मद सैयदुर रहमान कासमी ने भी जेडीयू के रुख की कड़ी आलोचना करते हुए कहा, “यह विधेयक शरीयत के खिलाफ है। इससे वक्फ की ज़मीनों पर कब्ज़ा होने का खतरा बढ़ जाएगा। अगर नीतीश कुमार इस विधेयक के खिलाफ नहीं हैं, तो हम उनके खिलाफ हैं।”
गौरतलब है कि यही नीतीश कुमार कभी धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देकर 2013 में एनडीए से अलग हो गए थे और 2014 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी के खिलाफ खड़े हुए थे। लेकिन इस बार वक्फ विधेयक जैसे संवेदनशील मुद्दे पर उन्होंने विपक्ष और मुस्लिम संगठनों के दबाव को नजरअंदाज कर बीजेपी का खुलकर समर्थन किया है। यहां तक कि कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता की दलीलें भी उन्होंने ठुकरा दीं।मुस्लिम धर्मगुरु अब जेडीयू को "धोखेबाज" तक कहने लगे हैं। मुस्लिम समुदाय में यह बात गहराई से फैल रही है कि जेडीयू ने इस बिल को समर्थन देकर अल्पसंख्यकों की जमीनें गिरवी रख दीं। कई धर्मगुरु कह रहे हैं कि अब समय आ गया है कि मुस्लिम समुदाय जेडीयू को सबक सिखाए।
बिहार विधानसभा चुनावों की तैयारी शुरू हो चुकी है और वक्फ विधेयक पर जेडीयू का समर्थन पार्टी को भारी पड़ सकता है। मुस्लिम वोट बैंक पर पकड़ रखने वाली जेडीयू को अब विरोधी दल और धार्मिक संगठन दोनों ही घेर रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या यह फैसला नीतीश कुमार के लिए राजनीतिक तौर पर "बैकफायर" करेगा? बावजूद इसके, पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद संजय झा ने संसद में विधेयक का बचाव करते हुए कहा कि यह कानून गरीब और पसमांदा मुस्लिमों के लिए फायदेमंद साबित होगा। उनके मुताबिक, "जेडीयू ने मुस्लिमों के लिए जितना किया है, उतना न तो कांग्रेस कर सकी और न ही आरजेडी।"





