हादसे के बाद रेलवे से जुड़े अधिकारी मौके पहुंचते हैं। राहत बचाव कार्य किया जाता है। कुछ ट्रेनों को रद्द और कुछ के रूट बदल दिए जाते हैं। हफ्ते पंद्रह दिन के लिए रेल लाइन बंद रहती है। उसके बाद पहले की तरह नियमित रूप से रेल लाइन को चालू कर दिया जाता है। लेकिन इतने में दूसरी जगह रेल हादसा हो जाता है। फिर यही प्रक्रिया होती है। लेकिन हादसे का सही कारण पता करने के लिए कोई जांच नहीं की जाती।

13 दिनों में सात रेल हादसे
ट्रेन हादसे में लोग अपनी जान गवां रहे हैं, 18 जुलाई को उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में चंडीगढ़-डिब्रूगढ़ एक्सप्रेस के कई डिब्बे पटरी से उतर गयी। इस हादसे में चार यात्रियों की मौत और 31 से अधिक लोग घायल हो गए थे। हादसे के बाद प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री ने घटना पर शोक संवेदना व्यक्त की थी। लेकिन कोई भी यह जिम्मेदारी नहीं लेता कि दुर्घटना कैसे हुई। किसी भी तरह की जांच के आदेश नहीं दिया गया जाता और भविष्य में ऐसी कोई घटना न हो उस पर विचार नहीं किया जाता।
इस हादसे के अलावा, 19 जुलाई को गुजरात के वलसाड में मालगाड़ी पटरी से उतर गई, 20 जुलाई को यूपी के अमरोहा में मालगाड़ी के 20 डिब्बे पटरी से उतर जाते हैं। ऐसी ही एक घटना अगले दिन यानी 21 जुलाई को राजस्थान के अलवर में होती हैं। यहां मालगाड़ी के तीन डब्बे पटरी से उतर गए थे। 21 जुलाई को ही पश्चिम बंगाल के रानाघाट में मालगाड़ी के कई डिब्बे पटरी से उतर गए। 26 जुलाई को ओडिशा के भुवनेश्वर में मालागाड़ी पटरी से उतर गई। 29 जुलाई को बिहार के समस्तीपुर में बिहार संपर्क क्रांति के डिब्बे अलग हो गए। ट्रेन का इंजन दो डिब्बों को लेकर आग बढ़ गया था और बाकि डिब्बे पीछे रह गए। गनीमत यह रही कि इस घटना में किसी की जान को कोई नुकसान नहीं हुआ। रेल हादसे के ताजा मामला 30 यानी मंगलवार का ही है। यह हादसा झारखंड में हुआ। हावड़ा-मुंबई एक्सप्रेस के 18 डिब्बे पटरी से उतर गए। इस हादसे में दो लोगों ने अपनी जान गवां दी है।





