अनुप्रिया पटेल ने द इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में कहा, "जाति व्यवस्था सदियों पुरानी सच्चाई है, और इसके आधार पर होने वाला भेदभाव आज भी समाज में मौजूद है। अगर हम देश को प्रगति की राह पर ले जाना चाहते हैं, तो हमें पहले इन असमानताओं को पहचानना होगा। जाति जनगणना उसी दिशा में पहला कदम है।"
उन्होंने कहा कि कई ओबीसी और अनुसूचित जाति समुदाय अभी भी पहचान और संसाधनों से वंचित हैं। पटेल ने कहा, “ओबीसी देश की सबसे बड़ी आबादी वाला वर्ग है, लेकिन हमारे पास इनके बारे में अद्यतन आंकड़े नहीं हैं। जब तक हमें इनकी सही संख्या और स्थिति का ज्ञान नहीं होगा, तब तक हम उनके लिए प्रभावी नीतियां नहीं बना सकते"
अनुप्रिया पटेल ने कहा कि जातिगत आंकड़े न केवल सामाजिक न्याय के लिए, बल्कि कल्याणकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए भी अनिवार्य हैं। उन्होंने जोड़ा, “यदि हम वास्तविक लाभार्थियों तक योजनाओं को पहुंचाना चाहते हैं तो हमें उनके बारे में ताज़ा और सटीक जानकारी होनी चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब कांग्रेस और यूपीए सरकारों को वर्षों तक सत्ता में रहने का मौका मिला, तब उन्होंने जाति जनगणना क्यों नहीं कराई?
उन्होंने कहा, “समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में चार बार सरकार चलाई, लालू प्रसाद यादव बिहार में वर्षों तक सत्ता में रहे और वो भी यूपीए का हिस्सा थे। उनके पास यह कदम उठाने का अवसर था, लेकिन उन्होंने नहीं किया।” केंद्रीय मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जातिगत जनगणना के सवाल पर जनता ने सिर्फ एक बार सत्ता का अवसर दिया और वह अपने पहले मौके में ही इस ऐतिहासिक निर्णय को लागू कर रहे हैं। उन्होंने इसे सामाजिक न्याय की दिशा में निर्णायक कदम बताया।





