वीएचपी के अंतरराष्ट्रीय संगठन महामंत्री मिलिंद परांडे ने इस आयोजन के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि कुंभ का स्थल हमेशा से आध्यात्मिक एकता का प्रतीक रहा है, और भारत में शैव, जैन, सिख, बौद्ध समेत कई धर्मों और परंपराओं का उद्भव हुआ है। उन्होंने बताया कि यह सम्मेलन इन विविध परंपराओं के बीच एकता को बढ़ावा देने और आपसी समझ को मजबूत करने के उद्देश्य से आयोजित किया जा रहा है।
कुंभ के इस महापर्व में वीएचपी द्वारा बौद्ध सम्मेलन का आयोजन संगठन की नीतियों में बदलाव का संकेत देता है, क्योंकि अब तक वीएचपी केवल हिंदू सम्मेलन आयोजित करती रही थी। यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत में दलित और पिछड़े वर्ग के एक बड़े हिस्से ने बौद्ध धर्म को अपनाया है। इस वर्ग को साधने के लिए भाजपा और आरएसएस की रणनीति के तहत इस बौद्ध सम्मेलन को एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
भाजपा और संघ परिवार का मानना है कि यदि वे बौद्ध समाज को जोड़ने में सफल होते हैं तो इससे आगामी चुनावों में उन्हें चुनावी लाभ मिल सकता है, साथ ही इससे हिंदू और बौद्ध समुदाय के बीच सामाजिक एकता भी स्थापित हो सकती है।
यह रणनीति हाल ही में महाराष्ट्र में हुए विधानसभा चुनावों में भी देखने को मिली थी, जब भाजपा ने बौद्ध समाज को अपने साथ जोड़ने के लिए विशेष प्रयास किए थे। महाराष्ट्र में भाजपा ने बौद्ध समुदाय से आने वाले नेता किरेन रिजिजू को इस समुदाय को जोड़ने का जिम्मा सौंपा था। यही कारण है कि इस बौद्ध सम्मेलन को भाजपा और संघ परिवार की लंबी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें उनका उद्देश्य बौद्धों को साथ लाकर एक मजबूत सामाजिक और राजनीतिक समर्थन जुटाना है।
इतिहास में 1966 में विश्व हिंदू परिषद की स्थापना के समय भी कुंभ में पहले हिंदू सम्मेलन का आयोजन किया गया था।
इस सम्मेलन का आयोजन संघ के दूसरे सरसंघचालक श्री माधव सदाशिव राव गोलवलकर की अहम भूमिका से हुआ था। तब से लेकर आज तक हर कुंभ में हिंदू धर्म को लेकर सम्मेलन और धर्म संसद का आयोजन किया जाता रहा है। लेकिन इस बार बौद्ध सम्मेलन का आयोजन यह दर्शाता है कि वीएचपी ने अपनी रणनीति में कुछ नया किया है, जिससे हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध धर्मों के बीच आपसी एकता को बढ़ावा मिल सके।
संघ के विचारक हमेशा से मानते आए हैं कि हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध धर्म भारत की पुण्यभूमि पर आधारित हैं, और इन सभी धर्मों के बीच एकता स्थापित होना चाहिए, क्योंकि उनके मूल्यों का गहरा संबंध भारतीय परंपराओं से है।
इस बौद्ध सम्मेलन का आयोजन इसी दिशा में एक अहम कदम है, जो ना सिर्फ धार्मिक एकता को बढ़ावा देने की कोशिश है, बल्कि भारतीय समाज में विभिन्न धर्मों के बीच तालमेल को भी मजबूती प्रदान करने का एक प्रयास है।
इस सम्मेलन को लेकर देशभर में कई प्रकार की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं, लेकिन वीएचपी और भाजपा इसे भारतीय समाज की समरसता को बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण कदम मान रही है।
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