Molitics Logo
होम 'यह न्यायालय नहीं, सुरक्षा एजेंसियों का मामला है' – SC में पहलगाम हमले की जांच याचिका खारिज

'यह न्यायालय नहीं, सुरक्षा एजेंसियों का मामला है' – SC में पहलगाम हमले की जांच याचिका खारिज

हमले की न्यायिक जांच की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई करने से साफ इनकार |

'यह न्यायालय नहीं, सुरक्षा एजेंसियों का मामला है' – SC में पहलगाम हमले की जांच याचिका खारिज
फोटो: 'यह न्यायालय नहीं, सुरक्षा एजेंसियों का मामला है' – SC में पहलगाम हमले की जांच याचिका खारिज
देश भर में पहलगाम में हुए हालिया आतंकी हमले को लेकर गुस्सा और आक्रोश चरम पर है। इस हमले में निर्दोष नागरिकों और सुरक्षाकर्मियों की जान जाने के बाद जहां एक ओर जनता न्याय की मांग कर रही है, वहीं दूसरी ओर इस हमले की न्यायिक जांच की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई करने से साफ इनकार कर दिया है और याचिकाकर्ता को कड़ी फटकार लगाई है।

न्यूज़ एजेंसी पीटीआई और ANI की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह शामिल थे, ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट शब्दों में कहा कि “न्यायाधीश आतंकवाद से जुड़े मामलों की जांच के विशेषज्ञ नहीं हैं और इस तरह के मामलों में न्यायिक आयोग का गठन कोई समाधान नहीं है।” पीठ ने कहा कि ऐसे मामले बेहद संवेदनशील होते हैं और इन्हें सुरक्षा एजेंसियों के विवेक और उनके विशेष प्रशिक्षण के अनुसार ही जांचा और परखा जाना चाहिए। कोर्ट ने पूछा, “क्या आप चाहते हैं कि हम सुरक्षा बलों का मनोबल तोड़ें?” यह टिप्पणी याचिकाकर्ता वकीलों की उस मांग के संदर्भ में थी जिसमें उन्होंने किसी सेवानिवृत्त हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की अध्यक्षता में जांच आयोग गठित करने की मांग की थी।

जस्टिस सूर्यकांत ने आगे कहा, “यह वह समय है जब पूरे देश को आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होकर खड़ा होना चाहिए। कृपया ऐसी कोई याचिका न लाएं जिससे सैनिकों और नागरिकों का मनोबल गिरे। यह तरीका गलत है। कोर्ट का इस्तेमाल ऐसे मुद्दों में नहीं होना चाहिए जिनमें प्रशासनिक और सुरक्षात्मक संवेदनशीलता सर्वोपरि हो।”

पीठ ने यह भी जोड़ा कि “हमारे पास कानून की व्याख्या और संविधान की रक्षा का अधिकार है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद जैसे विषयों में अदालत की भूमिका सीमित है। हमें यह समझना होगा कि ऐसे मामलों में सुरक्षा एजेंसियों का अनुभव और विशेषज्ञता सर्वोच्च होती है। न्यायपालिका इनका विकल्प नहीं हो सकती।”