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दलित को बीजेपी का अध्यक्ष बना विपक्ष के PDA की काट निकालने की राह पर आलाकमान

क्या इस बार उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का प्रदेश अध्यक्ष कोई दलित नेता होगा? आमतौर पर भाजपा के निर्णय पहले से खबरों में नहीं आते हैं।

दलित को बीजेपी का अध्यक्ष बना विपक्ष के PDA की काट निकालने की राह पर आलाकमान
फोटो: दलित को बीजेपी का अध्यक्ष बना विपक्ष के PDA की काट निकालने की राह पर आलाकमान
क्या इस बार उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का प्रदेश अध्यक्ष कोई दलित नेता होगा? आमतौर पर भाजपा के निर्णय पहले से खबरों में नहीं आते हैं। पार्टी ज्यादातर अचानक फैसले लेती है, और इन फैसलों को शीर्ष नेतृत्व से लेकर कार्यकर्ताओं तक सभी स्वीकार करते हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश में भाजपा के अगले अध्यक्ष को लेकर अटकलें तेज हैं कि इस बार किसी दलित नेता को यह जिम्मेदारी दी जा सकती है। इसके पीछे कारण यह माना जा रहा है कि समाजवादी पार्टी (सपा) के नेता अखिलेश यादव लगातार पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक (पीडीए) के मुद्दे को उठाकर भाजपा को घेर रहे हैं। ऐसे में भाजपा इस नैरेटिव का जवाब देने और अपनी रणनीति को मजबूत करने के लिए किसी दलित नेता को अध्यक्ष पद पर नियुक्त कर सकती है। पार्टी की योजना है कि ऐसा दलित नेता चुना जाए जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भाजपा का पुराना कार्यकर्ता हो, साथ ही वैचारिक रूप से दृढ़ और समर्पित हो।

 इस संदर्भ में तीन नेताओं के नाम चर्चा में हैं। अगर भाजपा दलित कार्ड खेलती है, तो इनमें से किसी एक को मौका मिलने की संभावना है। ये नेता हैं- विद्या सागर सोनकर, रामशंकर कठेरिया और राम सकल। अभी तक उत्तर प्रदेश में भाजपा ने कभी किसी दलित नेता को प्रदेश अध्यक्ष नहीं बनाया है। अगर इस बार ऐसा होता है, तो यह फैसला बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के समर्थकों को आकर्षित करने में मददगार साबित हो सकता है, जो लंबे समय से कमजोर पड़ रही है और जिसके वोट बैंक पर सपा भी नजर गड़ाए हुए है। साथ ही, अखिलेश यादव के पीडीए नारे, जो 2022 के विधानसभा चुनाव से ही गूंज रहा है, का भी प्रभावी जवाब दिया जा सकेगा। 

 हाल ही में भाजपा ने राज्य में 70 नए जिला और महानगर अध्यक्षों की घोषणा की थी। इनमें से 39 सवर्ण जातियों से थे, जिस पर सपा और बसपा ने तीखी प्रतिक्रिया दी थी। अखिलेश यादव ने सवाल उठाया था कि आखिर पिछड़ों और दलितों को मौका क्यों नहीं दिया गया। जिला अध्यक्षों की सूची में दलित समुदाय से केवल 6 नेता शामिल थे। ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष के रूप में दलित समाज से किसी नेता को चुनकर पार्टी संतुलन बनाने की कोशिश कर सकती है। भाजपा का नेतृत्व अपने अप्रत्याशित फैसलों के लिए जाना जाता है, और इस बार भी एक तेजतर्रार दलित नेता को मौका देकर वह सबको चौंका सकती है। वर्तमान में जाट समुदाय से आने वाले भूपेंद्र चौधरी प्रदेश अध्यक्ष हैं। उनसे पहले महेंद्रनाथ पांडेय, केशव प्रसाद मौर्य, स्वतंत्र देव सिंह और लक्ष्मीकांत वाजपेयी जैसे नेता इस पद पर रह चुके हैं। इनमें सवर्ण से लेकर पिछड़ा वर्ग तक के कई चेहरे शामिल रहे हैं। अब चर्चा है कि दलित समाज से किसी नेता को यह जिम्मेदारी दी जा सकती है। 

भाजपा ने गैर-यादव ओबीसी वर्ग को अपने साथ जोड़ने में काफी हद तक सफलता हासिल की है, लेकिन अब इस दायरे को और विस्तार देने के लिए दलित समुदाय को लुभाने वाला कदम उठाया जा सकता है। इन संभावित नामों में रामशंकर कठेरिया का नाम सबसे आगे चल रहा है। उन्हें पार्टी की विचारधारा को गहराई से समझने वाला और समर्पित नेता माना जाता है। जब इस बारे में भाजपा नेताओं से सवाल पूछा गया, तो उन्होंने खुलकर कुछ नहीं कहा। बस इतना संकेत दिया कि भाजपा सभी को अवसर देती है, और यह देखना बाकी है कि इस बार अध्यक्ष पद किसे मिलता है। लेकिन इतना तय माना जा रहा है कि यह फैसला चौंकाने वाला होगा।

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