इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल में यह सामने आया है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा 2009 में स्थापित एंटी-रैगिंग हेल्पलाइन पर दर्ज शिकायतों में बीते वर्षों में भारी वृद्धि हुई है। सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, जनवरी 2012 से अक्टूबर 2023 तक रैगिंग से कथित रूप से आत्महत्या या मौत के 78 मामले सामने आए। हालांकि, देश में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे 4.14 करोड़ छात्रों की तुलना में यह संख्या छोटी लग सकती है, लेकिन यह समस्या की गंभीरता को कम नहीं करता। यह आंकड़े बताते हैं कि रैगिंग पीड़ितों के लिए बनाई गई प्रणाली अपारदर्शी, तदर्थ और गैर-जवाबदेह बनी हुई है।
यूजीसी हेल्पलाइन पर अब तक 8,000 से अधिक रैगिंग की शिकायतें दर्ज हो चुकी हैं। 2012 से 2022 के बीच इसमें 208 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई। 2012 में जहां 358 शिकायतें आई थीं, वहीं 2019 में यह संख्या बढ़कर 1,115 हो गई और 2022 में 1,103 शिकायतें दर्ज की गईं। 2023 में अक्टूबर तक 756 शिकायतें आ चुकी थीं।
रैगिंग के कारण हुई 78 मौतों में सबसे अधिक 10 मामले महाराष्ट्र से सामने आए। उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में सात-सात, तेलंगाना में छह, आंध्र प्रदेश में पांच और मध्य प्रदेश में चार छात्रों की जान गई। इसी अवधि में रैगिंग की सबसे अधिक शिकायतें उत्तर प्रदेश (1,202) से आईं, इसके बाद मध्य प्रदेश (795), पश्चिम बंगाल (728), ओडिशा (517), बिहार (476) और महाराष्ट्र (393) का स्थान रहा। बीएचयू (72), भोपाल का मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (53) और ओडिशा का एमकेसीजी मेडिकल कॉलेज (49) रैगिंग के सबसे अधिक मामले दर्ज करने वाले संस्थान रहे।
इस पूरे मुद्दे को तब और गंभीर बना देता है कि यूजीसी के एंटी-रैगिंग नियमों के अनुसार, आयोग उन संस्थानों के खिलाफ कार्रवाई कर सकता है, जो रैगिंग को रोकने में विफल रहते हैं। लेकिन एक आरटीआई के जवाब में यूजीसी ने स्पष्ट किया कि 2009 में हेल्पलाइन शुरू होने के बाद से उसने किसी भी कॉलेज पर इस प्रावधान के तहत कार्रवाई नहीं की। इसके बजाय, यूजीसी ने एक अन्य खंड का उपयोग किया, जिसमें वह "अपनी शक्तियों के भीतर अन्य उचित कार्रवाई" कर सकता है। रैगिंग के खिलाफ अभियान चलाने वाले एनजीओ 'सोसाइटी अगेंस्ट वायलेंस इन एजुकेशन' (SAVE) का कहना है कि यूजीसी ने इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए। अमन मूवमेंट के संस्थापक राजेंद्र कचरू, जिनके बेटे अमन की रैगिंग के कारण आत्महत्या के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 2009 में दिशा-निर्देश जारी किए थे, मानते हैं कि सरकार की निष्क्रियता के कारण हजारों छात्रों को अब भी पीड़ा झेलनी पड़ रही है।
यूजीसी के नियमों के अनुसार, प्रत्येक छात्र को शैक्षणिक वर्ष की शुरुआत में यह शपथ पत्र देना होता है कि वह रैगिंग में शामिल नहीं होगा। लेकिन पिछले दशक के आरटीआई आंकड़े बताते हैं कि केवल 4.49 प्रतिशत छात्रों ने ही ऐसा किया है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के मुताबिक, संस्थानों को रैगिंग के मामलों की सूचना 24 घंटे के भीतर पुलिस को देनी होती है, लेकिन यूजीसी का कहना है कि वह ऐसे मामलों का कोई रिकॉर्ड नहीं रखता। इसके अलावा, यूजीसी के नियमों में रैगिंग की रोकथाम के लिए कॉलेज परिसरों में एंटी-रैगिंग दस्तों के गठन और छापेमारी का प्रावधान है, लेकिन आयोग के पास इन दस्तों द्वारा की गई किसी भी कार्रवाई का डेटा उपलब्ध नहीं है।
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