वहीं, अंग प्रत्यारोपण जैसे इलाज के नाम पर भारी भरकम बिल थोपे जाते हैं। इन समस्याओं को देखते हुए कोर्ट ने सरकार से निर्देश जारी करने को कहा, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी नीति में संतुलन बनाए रखा जाए ताकि निजी अस्पतालों का निवेश बाधित न हो।
क्यों हुई यह सुनवाई?
दरअसल, यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक तब पहुंचा जब सिद्धार्थ डालमिया नामक व्यक्ति ने एक रिट याचिका दायर की। उन्होंने आरोप लगाया कि निजी अस्पतालों में उनके रिश्तेदार के इलाज के दौरान उन्हें मनमाने बिल का सामना करना पड़ा। इस याचिका के आधार पर अदालत ने इस गंभीर मुद्दे पर सुनवाई की और सरकार को प्रभावी कदम उठाने के निर्देश दिए।
रिपोर्टों के अनुसार, निजी अस्पतालों में इलाज की लागत सरकारी अस्पतालों की तुलना में कई गुना अधिक होती है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के आंकड़ों के अनुसार:
सरकारी अस्पतालों में भर्ती का औसत खर्च: ₹4,452
निजी अस्पतालों में भर्ती का औसत खर्च: ₹31,854
कुछ मामलों में यह अंतर 200% तक बढ़ जाता है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, ताकि इलाज को सभी के लिए सुलभ और पारदर्शी बनाया जा सके।
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