अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विशाल सिंह ने कहा कि मेधा पाटकर एक प्रतिष्ठित सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने जनहित के लिए लंबे समय तक काम किया है। अदालत ने उनके अच्छे आचरण, बढ़ती उम्र, और पहले किसी आपराधिक मामले में दोषसिद्ध न होने के आधार पर उन्हें जेल न भेजने का निर्णय लिया। साथ ही, पाटकर पर लगाए गए 10 लाख रुपये के मुआवज़े को भी घटाकर 1 लाख रुपये कर दिया गया है, जिसे उन्हें वीके सक्सेना को अदा करना होगा।
इससे पहले, जुलाई 2024 में एक मजिस्ट्रेट अदालत ने मेधा पाटकर को भारतीय दंड संहिता की धारा 500 (मानहानि) के तहत दोषी ठहराया था और उन्हें पांच महीने के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी। उस समय अदालत ने 10 लाख रुपये का मुआवज़ा देने का भी आदेश दिया था। हालांकि, बाद में उन्हें जमानत मिल गई और सत्र न्यायालय में अपील के बाद उनकी सजा पर रोक लगा दी गई। मेधा पाटकर अदालत में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश हुईं। अदालत ने स्पष्ट किया कि उनके अपराध की प्रकृति ऐसी नहीं है कि उन्हें जेल भेजा जाए। न्यायाधीश ने कहा कि यह निर्णय न केवल उनके सामाजिक योगदान का सम्मान करता है बल्कि यह भी दर्शाता है कि कानून में मानवीय दृष्टिकोण के लिए स्थान है।
यह मामला वर्ष 2000 की एक प्रेस विज्ञप्ति से जुड़ा है, जिसे लेकर वीके सक्सेना ने मानहानि का दावा किया था। उस समय, पाटकर ने सक्सेना को ‘कायर’ कहने के साथ-साथ उन पर हवाला लेन-देन में संलिप्त होने का आरोप लगाया था। सक्सेना ने यह मामला नेशनल काउंसिल ऑफ सिविल लिबर्टीज के अध्यक्ष के तौर पर दायर किया था। अदालत ने पाया कि यह प्रेस विज्ञप्ति सक्सेना की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने के उद्देश्य से तैयार की गई थी और उसमें लगाए गए आरोप उनकी ईमानदारी व जनसेवा पर सीधा हमला थे।
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