कोर्ट ने इस बात को महत्वपूर्ण माना कि आरोपी सिर्फ दर्शक के रूप में वहां मौजूद हो सकते थे, और उनकी गिरफ्तारी से कोई ठोस निष्कर्ष नहीं निकलता है।
इस मामले में धीरूभाई भाईलालभाई चौहान और अन्य पांच आरोपियों को वडोद गांव में एक मस्जिद और कब्रिस्तान को कथित रूप से घेरने वाली भीड़ का हिस्सा मानते हुए एक साल की सजा सुनाई गई थी। हालांकि, निचली अदालत ने सभी 19 आरोपियों को बरी कर दिया था, लेकिन हाईकोर्ट ने छह आरोपियों को दोषी ठहराया था। एक आरोपी की मुकदमे के दौरान मृत्यु हो गई थी। इन आरोपियों को घटना स्थल से गिरफ्तार किया गया था। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने इस गिरफ्तारी को दोषी ठहराने का आधार नहीं माना, और निचली अदालत के 2003 के फैसले को सही ठहराते हुए इन आरोपियों को बरी कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल घटना स्थल पर मौजूदगी और गिरफ्तारी यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकती कि आरोपी किसी अपराध में संलिप्त थे, खासकर जब उनके पास से न तो विध्वंसक सामग्री मिली और न ही कोई हथियार।
कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि पुलिस द्वारा की गई गोलीबारी के कारण लोग इधर-उधर भागे थे, और इस प्रकार की स्थिति में कई निर्दोष लोग भी अपराधी समझे जा सकते हैं। इस तरह की सामूहिक झड़पों में यह महत्वपूर्ण होता है कि अदालत यह सुनिश्चित करे कि कोई निर्दोष व्यक्ति दोषी न ठहराया जाए और उसकी स्वतंत्रता छीनी न जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अदालतों पर यह जिम्मेदारी होती है कि वे सावधानीपूर्वक यह सुनिश्चित करें कि किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने से पहले उसके खिलाफ प्रत्यक्ष और ठोस आरोप हों। कोर्ट ने यह कहा कि गवाहों के बयानों पर आधारित दोषसिद्धि में काफी सावधानी बरतनी चाहिए, खासकर तब जब गवाहों का बयान केवल सामान्य हो और आरोपियों के कृत्य या उनकी भूमिका के बारे में विशेष जानकारी न हो।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी ध्यान दिलाया कि जब अपराध का स्थान सार्वजनिक स्थान होता है, तो लोग अक्सर जिज्ञासा के चलते घटनास्थल पर पहुंच जाते हैं, और वे केवल घटनाओं के दर्शक होते हैं।
ऐसे में, गवाहों को गैरकानूनी भीड़ का हिस्सा मान लेना गलत हो सकता है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में, अदालत को यह निर्धारित करना महत्वपूर्ण है कि आरोपी वास्तव में अपराध में संलिप्त था या वह केवल दर्शक था। यह निर्धारण केस के तथ्यों पर आधारित होना चाहिए, और इसमें किसी भी प्रकार की पूर्वाग्रह से बचना चाहिए।
इसके अतिरिक्त, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि आरोपियों के पास कोई विध्वंसक सामग्री थी या वे किसी अपराध में सक्रिय रूप से शामिल थे। कोर्ट ने यह टिप्पणी भी की कि हाईकोर्ट का दृष्टिकोण, जो आरोपियों को दोषी ठहराने का था, पूरी तरह से अनुचित था, क्योंकि इसके लिए कोई ठोस साक्ष्य या कानूनी आधार नहीं था।
इस प्रकार, सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया, जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि केवल घटना स्थल पर मौजूदगी से किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना उचित नहीं है, और अदालतों को इस प्रकार के मामलों में निष्पक्षता और सावधानी से काम करना चाहिए।
Read This Also:- मणिपुर गए SC जजों के प्रतिनिधिमंडल में एक जज पर ‘समुदाय’ पक्षपाती का आरोप, वकीलों में नाराजगी
Read This Also:- मणिपुर गए SC जजों के प्रतिनिधिमंडल में एक जज पर ‘समुदाय’ पक्षपाती का आरोप, वकीलों में नाराजगी





