मुजफ्फरनगर का नाम बदलने की मांग और सियासी विवाद
दरअसल, उत्तर प्रदेश विधान परिषद के बजट सत्र के दौरान बीजेपी के एमएलसी और प्रदेश उपाध्यक्ष मोहित बेनीवाल ने मुजफ्फरनगर का नाम बदलकर 'लक्ष्मीनगर' करने की मांग उठाई थी। उन्होंने कहा कि यह जनभावना से जुड़ा हुआ मुद्दा है और सरकार को इसे गंभीरता से लेना चाहिए। उनकी इस मांग के बाद राज्य की राजनीति गर्मा गई और विपक्षी दलों ने इसे लेकर बीजेपी पर हमला बोल दिया।
समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इस मांग का कड़ा विरोध किया और बीजेपी सरकार को 'नाम बदलने वाली सरकार' करार दिया। विपक्ष का आरोप है कि योगी सरकार असल मुद्दों से भटकाने के लिए जगहों और शहरों के नाम बदलने में लगी रहती है।
शिवपाल सिंह यादव ने बीजेपी पर निशाना साधते हुए कहा कि, "बीजेपी के लोग जनता में भ्रम फैलाते हैं, सदन में झूठ बोलते हैं। कुछ मुद्दे राजनीतिक नहीं होते, लेकिन मुख्यमंत्री जबरदस्ती उन्हें राजनीतिक रंग देने की कोशिश करते हैं।" उन्होंने कहा कि सरकार को बेरोजगारी, महंगाई और कानून-व्यवस्था जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए, लेकिन बीजेपी नेताओं का ध्यान केवल नाम बदलने पर रहता है। इस मुद्दे पर उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सभी सदस्यों को अपनी बात रखने का अधिकार है, और सरकार जनभावना के अनुरूप कार्य करेगी। उन्होंने विपक्ष पर हमला बोलते हुए कहा कि, "चोर की दाढ़ी में तिनका है।"
संभल मुद्दे पर बोलते हुए मौर्य ने कहा कि, "हमारी प्राथमिकता विरासत और विकास है, और हम इसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।"
उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों में कई शहरों के नाम बदले गए हैं। इलाहाबाद का नाम प्रयागराज, फैजाबाद का नाम अयोध्या, मुगलसराय का नाम दीनदयाल उपाध्याय नगर किया गया था। अब मुजफ्फरनगर का नाम लक्ष्मीनगर करने की मांग के साथ यह बहस फिर से तेज हो गई है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी इस रणनीति के जरिए हिंदुत्व की राजनीति को आगे बढ़ाना चाहती है, जबकि विपक्ष इसे जनता के असली मुद्दों से ध्यान भटकाने का प्रयास बता रहा है।
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