यह मामला दिल्ली हाई कोर्ट में 70 वकीलों को सीनियर एडवोकेट का दर्जा दिए जाने के खिलाफ दायर याचिका से जुड़ा हुआ था। याचिका में यह आरोप लगाया गया था कि जजों के रिश्तेदारों को यह विशेष दर्जा प्रदान किया गया है, जिसे अदालत ने गंभीरता से लिया।
इस पर वकील ने दावा किया कि उसने एक चार्ट पेश किया है, जो उसके आरोपों का समर्थन करता है, लेकिन अदालत ने इस पर असहमति जताते हुए कहा कि यह पर्याप्त नहीं है। बेंच ने कहा कि अगर याचिका में इन आरोपों को नहीं हटाया गया तो वकील के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। कोर्ट ने वकील को याचिका में संशोधन करने का निर्देश दिया और चेतावनी दी कि अगर वह ऐसा नहीं करते तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
अदालत ने बार एसोसिएशन पर भी कड़ा ऐतराज जताया, जब वकील ने आरोप लगाया कि बार एसोसिएशन जजों से डरती है। जस्टिस गवई ने कहा, "यह अदालत है, यहां कानूनी दलीलें दी जाती हैं, न कि भाषण। मुंबई के आज़ाद मैदान में आप जो चाहे बोल सकते हैं, लेकिन यहां नहीं।"
इसके साथ ही बेंच ने कहा कि इस याचिका पर साइन करने वाले एक वकील को अदालत की अवमानना के आरोप में घसीटा जा सकता है, क्योंकि इस मामले में कई गंभीर सवाल उठे हैं। दिल्ली हाई कोर्ट में 70 वकीलों को सीनियर एडवोकेट का दर्जा देने का फैसला शुरुआत से ही विवादों में रहा है। इस फैसले के बाद एक परमानेंट कमेटी के सदस्य ने इस्तीफा दे दिया था, क्योंकि उनका आरोप था कि बिना उनकी सलाह के ही अंतिम सूची तैयार कर दी गई थी। इसके अलावा, फाइनल लिस्ट में छेड़छाड़ के आरोप भी सामने आए हैं। इस प्रकार यह मामला न केवल कानूनी प्रक्रिया बल्कि न्यायपालिका में पारदर्शिता और निष्पक्षता पर भी सवाल उठाता है।





