दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार की इस पहल को कटघरे में खड़ा करते हुए इसे मुस्लिम समुदाय को विशेष लाभ पहुंचाने की कोशिश करार दिया है और तीखी आलोचना की है।
हाई कोर्ट ने कई जातियों की ओबीसी सूची को अवैध ठहराया था
यह विवाद उस समय और तेजी से गरमाया जब 22 मई, 2024 को कलकत्ता हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में राज्य सरकार द्वारा 2010 से लेकर अब तक कई जातियों को दी गई ओबीसी आरक्षण की सूची को पूरी तरह से अवैध और असंवैधानिक घोषित कर दिया था। हाई कोर्ट ने अपने विस्तृत निर्णय में पाया कि इन जातियों को ओबीसी श्रेणी में शामिल करने का एकमात्र आधार उनका धार्मिक पहचान था, जो भारत के संविधान के मूल सिद्धांतों और समानता के अधिकार का स्पष्ट उल्लंघन है। कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में यह भी जोड़ा कि 77 मुस्लिम जातियों को ओबीसी सूची में शामिल करना न केवल अनुचित है, बल्कि यह पूरे मुस्लिम समुदाय के लिए अपमानजनक भी है। हालांकि, हाई कोर्ट ने यह स्पष्टता प्रदान की थी कि जिन व्यक्तियों को पहले से ही आरक्षण का लाभ मिल चुका है या जो सरकारी नौकरियों में कार्यरत हैं, उनकी सेवाओं या लाभों पर इस फैसले का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
बीजेपी का गंभीर आरोप- 'मुस्लिम तुष्टिकरण' की साजिश
पश्चिम बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले यह मुद्दा अब एक बड़े राजनीतिक विवाद का रूप ले चुका है। बीजेपी ने तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया है कि राज्य सरकार द्वारा कराया जा रहा जातिगत सर्वेक्षण केवल मुस्लिम ओबीसी को लाभ पहुंचाने और हिंदू ओबीसी को जानबूझकर नजरअंदाज करने की एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा है। बीजेपी के महासचिव जगन्नाथ चटर्जी ने हाल ही में मीडिया के साथ बातचीत में इस मुद्दे पर अपनी पार्टी का रुख स्पष्ट करते हुए कहा, "टीएमसी सरकार का यह सर्वेक्षण विशुद्ध रूप से राजनीतिक तुष्टिकरण का हथियार है। वे मुस्लिम समुदाय की आर्थिक स्थिति से जुड़े आंकड़े एकत्र कर रहे हैं, ताकि सरकारी योजनाओं और लाभों को विशेष रूप से उनके लिए सुनिश्चित किया जा सके, जबकि हिंदू ओबीसी समुदाय को इस प्रक्रिया से पूरी तरह बाहर रखा जा रहा है।"
उन्होंने आगे यह भी इल्जाम लगाया कि सर्वे में शामिल सवालों को इस तरह से तैयार किया गया है कि यह समुदायों के बीच वैमनस्य और फूट को बढ़ावा दे सके।
चटर्जी ने कहा, "इस सर्वे में ऐसे सवाल पूछे जा रहे हैं कि उनके इलाकों में पानी की उपलब्धता और सुविधा कैसी है और क्या वे अपने पड़ोसियों के साथ भोजन साझा करते हैं। यह एक सोची-समझी और खतरनाक साजिश है, जिसका मकसद सांप्रदायिक तनाव को भड़काना और सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंचाना है।"
सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख- ठोस सबूत पेश करें
सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही पश्चिम बंगाल सरकार से सख्ती के साथ यह मांग की थी कि वह ओबीसी सूची में शामिल की गई नई जातियों के सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन से संबंधित ठोस, विश्वसनीय और तथ्यपरक सबूत कोर्ट के समक्ष पेश करे। इसके साथ ही, कोर्ट ने राज्य सरकार से यह भी जवाब मांगा कि इन जातियों को ओबीसी श्रेणी में शामिल करने से पहले क्या किसी तरह की कानूनी सलाह या विशेषज्ञ राय ली गई थी। अब जब राज्य सरकार ने तीन महीने के भीतर इस समीक्षा को पूरा करने का वचन दिया है, तो जुलाई 2025 में सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर अपना अंतिम और निर्णायक फैसला सुना सकता है। इस बीच, पश्चिम बंगाल में इस मुद्दे को लेकर सियासी घमासान और तेज होने के पूरे आसार नजर आ रहे हैं।
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