Molitics Logo
होम वक्फ एक्ट में बदलाव पर सियासी घमासान, हिंदू संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में जताया समर्थन

वक्फ एक्ट में बदलाव पर सियासी घमासान, हिंदू संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में जताया समर्थन

अखिल भारतीय हिंदू महासभा के सदस्य सतीश कुमार अग्रवाल और हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता की ओर से दाखिल इन याचिकाओं में कहा गया है |

वक्फ एक्ट में बदलाव पर सियासी घमासान, हिंदू संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में जताया समर्थन
फोटो: वक्फ एक्ट में बदलाव पर सियासी घमासान, हिंदू संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में जताया समर्थन
वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 को लेकर देशभर में विरोध की लहर दौड़ पड़ी है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM), कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने इस अधिनियम की संवैधानिकता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। दूसरी ओर, केंद्र सरकार ने भी इस मामले में शीर्ष अदालत में कैविएट दायर कर रखी है, जिससे बिना उसकी बात सुने कोई आदेश न दिया जा सके। इसी बीच, हिंदू संगठनों ने वक्फ कानून में हुए संशोधनों का समर्थन करते हुए सुप्रीम कोर्ट में हस्तक्षेप याचिकाएं दायर की हैं। अखिल भारतीय हिंदू महासभा के सदस्य सतीश कुमार अग्रवाल और हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता की ओर से दाखिल इन याचिकाओं में कहा गया है कि अधिनियम में किए गए संशोधन पूरी तरह संविधान के अनुरूप हैं।

हिंदू संगठनों की ओर से पेश अधिवक्ता वरुण सिन्हा ने तर्क दिया कि वक्फ अधिनियम, 1995 की धारा 40 के तहत वक्फ बोर्ड को किसी भी संपत्ति को 'वक्फ संपत्ति' घोषित करने का अधिकार प्राप्त था, जिसका कई बार दुरुपयोग किया गया। याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि इस प्रावधान के तहत वक्फ बोर्ड ने अनेक बार गैर-मुस्लिमों की संपत्तियों पर भी दावा कर दिया, जिससे विवाद उत्पन्न हुए। इसी कारण सरकार को कानून में संशोधन करने के लिए बाध्य होना पड़ा।

याचिका में यह भी कहा गया है कि धार्मिक मान्यताओं के आधार पर ऐसा कोई कानून नहीं बनाया जा सकता, जो किसी अन्य समुदाय की संपत्ति को अधिग्रहित करने की असीमित शक्ति प्रदान करता हो।अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष 16 अप्रैल को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है। इस पीठ की अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना करेंगे, जबकि उनके साथ जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस केवी विश्वनाथन भी शामिल होंगे।

गौरतलब है कि वक्फ संशोधन विधेयक 2025 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 5 अप्रैल को अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी थी, जिसके साथ ही यह एक पूर्ण कानून बन गया है। इस कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गई हैं, जिनमें इसे मुस्लिम समुदाय के अधिकारों का उल्लंघन और पक्षपातपूर्ण बताया गया है।