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जस्टिस वर्मा विवाद के बीच चर्चा में आया NJAC, जवाबदेही से जुड़ा है मुद्दा, कांग्रेस सहित विपक्ष शर्तों पर अड़ा

दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस वर्मा के घर से अधजली नोटों की गड्डियां मिलने की कथित घटना के बाद राजनीतिक और कानूनी हलकों में जबरदस्त हलचल मच गई है।

जस्टिस वर्मा विवाद के बीच चर्चा में आया NJAC, जवाबदेही से जुड़ा है मुद्दा, कांग्रेस सहित विपक्ष शर्तों पर अड़ा
फोटो: जस्टिस वर्मा विवाद के बीच चर्चा में आया NJAC, जवाबदेही से जुड़ा है मुद्दा, कांग्रेस सहित विपक्ष शर्तों पर अड़ा
दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस वर्मा के घर से अधजली नोटों की गड्डियां मिलने की कथित घटना के बाद राजनीतिक और कानूनी हलकों में जबरदस्त हलचल मच गई है। इस मामले की जांच अभी जारी है और इस बीच राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) के मुद्दे पर एक बार फिर से चर्चा शुरू हो गई है। कांग्रेस नेतृत्व ने इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए संकेत दिया है कि वह न्यायिक जवाबदेही को लेकर 10 साल पहले पेश किए गए विधेयक का समर्थन तो करता है, लेकिन वह किसी ऐसे प्रस्तावित कानून का समर्थन नहीं करेगा जो न्यायिक नियुक्तियों में सरकार के हस्तक्षेप को बढ़ावा दे। असल में, 2024 में नरेंद्र मोदी की सरकार ने न्यायिक नियुक्तियों के कोलेजियम सिस्टम को समाप्त करने और राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) को लागू करने के लिए विधेयक पेश किया था। यह विधेयक संसद के दोनों सदनों में बड़े आसानी से पास हो गया था और कांग्रेस ने भी इसका समर्थन किया था। 

हालांकि, अक्टूबर 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने इस अधिनियम को खारिज कर दिया था, जिसके बाद एनजेएसी का कानून लागू नहीं हो सका। अब एक बार फिर से यह मुद्दा गर्मा गया है, खासकर जस्टिस वर्मा मामले के बाद। हाल ही में राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ के समक्ष कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने जस्टिस वर्मा के कैश कांड का मुद्दा उठाया। इस दौरान उपराष्ट्रपति और राज्यसभा सभापति जगदीप धनखड़ ने NJAC अधिनियम का जिक्र करते हुए कहा कि इस ऐतिहासिक कानून ने संसद में अभूतपूर्व सर्वसम्मति से पारित होकर एक गंभीर समस्या का समाधान किया। 25 मार्च को धनखड़ ने फिर से इस मुद्दे को उठाया और कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट ने NJAC अधिनियम को रद्द नहीं किया होता, तो स्थिति पूरी तरह से अलग होती और आज हम इस मुद्दे पर और प्रगति कर चुके होते। विपक्ष के कई नेताओं ने इसे उपराष्ट्रपति द्वारा उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति से जुड़ी कॉलेजियम प्रणाली पर पार्टियों के दृष्टिकोण को समझने की कोशिश के रूप में देखा है। सूत्रों ने बताया कि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने धनखड़ से मुलाकात से पहले पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं से इस मुद्दे पर सलाह ली थी। इन नेताओं ने खड़गे से कहा कि कांग्रेस को इस बात पर सैद्धांतिक रूप से सहमत होना चाहिए कि कॉलेजियम के विकल्प के रूप में एक नया तंत्र लाया जाए, लेकिन इसका नियंत्रण कार्यपालिका के हाथों में न हो, क्योंकि इससे सरकार को न्यायिक नियुक्तियों के तंत्र पर नियंत्रण करने का अवसर मिल सकता है, जो न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए खतरनाक हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील और राज्यसभा सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि कॉलेजियम प्रणाली काफी हद तक विफल हो गई है और इसकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। उन्होंने जस्टिस वर्मा विवाद पर कहा कि भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना द्वारा उठाए गए कदम सराहनीय हैं, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि इस दुखद घटना को लेकर तुरंत एनजेएसी की मांग करना उचित नहीं होगा। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि यह मानना कि एनजेएसी लागू होने से सभी न्यायिक चयन और नियुक्तियों से जुड़ी समस्याएं स्वतः हल हो जाएंगी, यह एक गलतफहमी होगी। सिंघवी ने यह भी कहा कि हालांकि कॉलेजियम प्रणाली में सरकार का कोई औपचारिक और विधिक अधिकार नहीं है, लेकिन सरकार इस क्षेत्र में अत्यधिक हस्तक्षेप करती रही है। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि अगर एनजेएसी में सरकार को औपचारिक अधिकार दिए जाते हैं, तो क्या इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता को गंभीर खतरा होगा? उनके अनुसार, सरकार को एक व्यापक और सुधारित एनजेएसी विधेयक लाना चाहिए, जिस पर नागरिक समाज और राजनीतिक वर्ग उचित रूप से विचार कर सके और उसमें न्यायपालिका की स्वतंत्रता की पूरी रक्षा की जा सके।

लोकसभा सांसद मनीष तिवारी ने इस मुद्दे पर कहा कि यह सिर्फ न्यायिक नियुक्तियों का सवाल नहीं है, बल्कि यह महाभियोग के दायरे से बाहर न्यायपालिका की जवाबदेही का भी सवाल है। उन्होंने एनजेएसी के सीमित दायरे को लेकर कहा कि यह नियुक्तियों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसमें न्यायपालिका की जवाबदेही को सुनिश्चित करने के लिए व्यापक प्रावधान होना चाहिए। तिवारी ने यह भी बताया कि यूपीए सरकार ने न्यायिक मानक और जवाबदेही विधेयक पेश किया था, जिसे दुर्भाग्यवश रद्द कर दिया गया। उन्होंने कहा कि संसद को इस मुद्दे पर गहन विचार-विमर्श करने की आवश्यकता है और सरकार को संसद को सूचित करने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। तिवारी ने चिंता जताई कि अगर संसद इस गंभीर मुद्दे पर चुप रहती है, तो यह अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ने जैसा होगा। उन्होंने इस बात की आवश्यकता जताई कि संसद के पीठासीन अधिकारियों को पहल करनी चाहिए और सरकार से संसद के दोनों सदनों में इस मुद्दे पर बयान देने के लिए कहना चाहिए। तिवारी के अनुसार, यह एक महत्वपूर्ण और व्यापक मुद्दा है, जिसे केवल न्यायिक नियुक्तियों तक सीमित नहीं रखा जा सकता, बल्कि न्यायपालिका की जवाबदेही और स्वायत्तता से जुड़ी अन्य जटिलताओं पर भी विचार करना चाहिए।

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