एक बार फिर भारत बंद। इस बार अनु. जाति और अनु. जनजाति के लोगों की जानिब से। लेकिन क्यों?
सुप्रीम कोर्ट का एक आदेश आता है कि जंगलों को खाली कराया जाए। हालाँकि इसपर केंद्र के पिटीशन के बाद स्टे लगा दिया गया है। लेकिन अनु. जनजाति के लोग चाहते हैं कि एक मजबूत कानून बने ताकि इस परेशानी का स्थायी समाधान निकल सके। और इसके लिए उन्होंने शांतिपूर्ण बंद का रास्ता अख़्तियार किया।
अनु. जाति के लोग भी इस विरोध में शामिल हैं। उनका विरोध है Exclusionary Politics के खिलाफ। नीतिगत तरीकों से दलितों के सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ । 13 प्वाइंट रोस्टर के खिलाफ। क्योंकि इस रोस्टर के ज़रिए उच्च शिक्षा के संस्थानों में दलित शिक्षकों की नियुक्तियाँ लगभग खत्म कर दी जाएँगी।
13 प्वाइंट रोस्टर है क्या? इसके अनुसार एक डिपार्टमेंट को एक यूनिट के तौर पर समझा जाएगा और आरक्षण इन डिपार्टमेंटल सीट्स पर होगा न कि पूरी यूनीवर्सिटी के स्तर पर। जब भी किसी डिपार्टमेंट में नियुक्तियाँ निकलती हैं तो पहली तीन रिक्तियों पर अनारक्षित वर्ग के लोगों की नियुक्ति होगी चौथे, आठवें और बारहवें पर ओबीसी की सातवें पर एससी की और चौदहवें पर एसटी की।
जब तक किसी डिपार्टमेंट में 7 सीटें नहीं होंगी तब तक एससी और 14 सीटें नहीं होगी तब तक एसटी समुदाय का व्यक्ति प्रतिनिधित्व नहीं कर पाएगा।
इससे होगा क्या? यूनीवर्सिटी में दलित और अनु. जनजाति के लोगों की भर्तियाँ लगभग शून्य हो जाएँगी।
सेंट्रल यूनीवर्सिटी ऑफ गुजरात के प्रोफेसर सोनी ने हमें बातचीत के दौरान बताया कि 13 प्वाइंट रोस्टर का order of implementation संवैधानिक निर्देशों की अवहेलना करता है। यूनीवर्सिटीज़ में पहले से ही दलित समुदाय के लोगों की कमी है। कोई भी नई नियुक्ति अगर 13 प्वाइंट रोस्टर या 200 प्वाइंट रोस्टर के आधार पर भी की जाती है तो दलितों का representation और कम होगा।
दलित मामलों के जानकार दिलीप मंडल कहते हैं कि सरकार इसके ज़रिए आरक्षण को खत्म कर देने का लिटमस टेस्ट करना चाहती है।
संविधान निर्माता बाबासाहेब ने समुदाय विशेष को आरक्षण की ताकत इसलिए ही दी थी कि प्रॉपर रिप्रेजेंटेशन मिल सके। प्रतिनिधित्व बढ़ने के साथ ही, सामाजिक शक्ति भी बढ़ती। और जब समानता किताबों से निकलकर धरातल पर समुदायों के बीच दिखता, तो शायद आरक्षण खत्म कर दिया जाता। लेकिन जातिगत भेदभाव का मानसिक कीड़ा आज़ादी के इतने सालों बाद भी फलता फूलता जा रहा है।
आरक्षण एक मजबूरी है, एक सहारा जो कि सदियों से व्याप्त जातिगत कुप्रथाओं के कारण पाताल तक धँसे वंचित वर्ग को समाज के अन्य वर्गों के समकक्ष ला सके लेकिन इस एक हथियार के तौर पर प्रचारित किया गया। केवल इसलिए ताकि अलग अलग वर्गों में एक दूसरे के प्रति नफ़रत के भाव पैदा हों। लड़ाइयाँ हों और फिर से एक वर्ग शोषित रह जाए। पिछड़ा रह जाए।
बीजेपी की मनुवादी विचारधारा समय समय पर दृष्टिगोचर होती रही है। 13 प्वाइंट रोस्टर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद केंद्र सरकार विरोध कर सकती थी लेकिन नहीं। केंद्र सरकार चुप रही। वहीं, आर्थिक आधार पर आरक्षण के लिए बिल लाकर आरक्षण पर एक नए बहस को जन्म दिया। तो क्या बीजेपी जिसपर मनुवाद के आरोप आम हैं, वो सच में आरक्षण समाप्त कर सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों को सामाजिक ढ़ाँचे से दूर कर देना चाहती है?





