यह हमारे लिए संभव नहीं है। मेरी बच्ची अस्पताल में भर्ती है। मुझे वहां होना चाहिए, लेकिन मैं यहां फंसा हुआ हूं।"
डॉक्टर अनिल ने यह भी बताया कि हॉस्टल के हर कमरे में चार से पांच रेजिडेंट डॉक्टर रहते थे। हादसे के वक्त जो डॉक्टर ड्यूटी पर नहीं थे, उनमें से कई अब इस दुनिया में नहीं हैं। उन्होंने कहा, "हमारे कुछ साथी हॉस्पिटल में जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं। हमारी हालत समझने की कोशिश कीजिए। हमें रातों-रात सामान खाली करने को कहा जा रहा है, जबकि यह बिल्कुल भी आसान नहीं है।"
अपनी पत्नी के साथ असिस्टेंट प्रोफेसर के तौर पर काम कर रहे डॉक्टर अनिल ने बताया कि वह दोनों हादसे के वक्त ड्यूटी पर थे। उनकी बेटी और मेड हॉस्टल में थीं, जिन्हें गार्ड ने बचाया और एंबुलेंस से अस्पताल पहुंचाया। वह बोले, "मैं चार साल से यहां रह रहा हूं। यह हमारा घर जैसा बन चुका है। अचानक से इसे खाली करना हमारे लिए मुश्किल है।"
उन्होंने अंत में मीडिया और प्रशासन से अपील करते हुए कहा, "प्लीज, हमारी मजबूरी को समझिए। हम पहले से ही इस हादसे की पीड़ा झेल रहे हैं। हमारी मांग सिर्फ इतनी है कि हमें कुछ समय दिया जाए ताकि हम अपना सामान ठीक से निकाल सकें।
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