कोर्ट ने कहा कि नागरिकों के पास यह दावा करने का कोई अधिकार नहीं है कि लाउडस्पीकर के बिना उनका कोई धार्मिक या अन्य अधिकार प्रभावित होगा। उच्च न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि यह समय की जरूरत है कि धर्म, संस्कृति या अन्य किसी उद्देश्य के नाम पर सार्वजनिक स्थानों पर शोर का स्तर नियंत्रित किया जाए ताकि लोगों की शांति और स्वास्थ्य की रक्षा की जा सके।
यह फैसला कुर्ला उपनगर के दो आवास संघों द्वारा दायर याचिका के आधार पर लिया गया था। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि उनके क्षेत्र में स्थित मस्जिदों से लाउडस्पीकर की आवाज़ के कारण ध्वनि प्रदूषण बढ़ गया है और पुलिस इस समस्या के समाधान में कोई कदम नहीं उठा रही है। उन्होंने यह भी कहा कि मस्जिदों में अजान सहित धार्मिक उद्देश्यों के लिए लाउडस्पीकर का उपयोग शांति भंग करता है और यह ध्वनि प्रदूषण (विनियमन और नियंत्रण) नियम 2000 के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 का उल्लंघन करता है।
कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि मुंबई, जैसे बड़े महानगर में जहां विभिन्न धर्मों, संस्कृतियों और समुदायों के लोग एक साथ रहते हैं, यह बहुत महत्वपूर्ण है कि किसी भी प्रकार का शोर न हो, जो किसी विशेष समुदाय या धर्म के अधिकारों का उल्लंघन करता हो।
कोर्ट ने कहा कि यह जनहित में है कि लाउडस्पीकर के इस्तेमाल की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, खासकर उन इलाकों में जहां ध्वनि प्रदूषण की समस्याएँ पहले से मौजूद हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस प्रकार की अनुमति देने से भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 या 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता या अन्य अधिकारों का उल्लंघन नहीं होगा, क्योंकि लाउडस्पीकर का इस्तेमाल किसी धर्म का अनिवार्य हिस्सा नहीं है।
अदालत ने राज्य सरकार और संबंधित प्राधिकरणों को यह भी निर्देश दिया कि वे धार्मिक संस्थाओं को यह सुनिश्चित करने के लिए उपयुक्त तंत्र विकसित करने का आदेश दें, जिससे ध्वनि स्तर को नियंत्रित किया जा सके।
कोर्ट ने खासतौर पर ध्वनि प्रणालियों के स्वचालित डेसिबल सीमा निर्धारण की प्रक्रिया को अपनाने की बात की, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कोई भी धार्मिक स्थल ध्वनि प्रदूषण के नियमों का उल्लंघन न करे। इसके साथ ही, अदालत ने पुलिस को निर्देश दिया कि वे किसी भी धार्मिक स्थल पर लाउडस्पीकर के खिलाफ शिकायत मिलने पर तुरंत कार्रवाई करें, बिना शिकायतकर्ता की पहचान मांगे, ताकि शिकायतकर्ताओं को किसी प्रकार की प्रतिशोध या घृणा का सामना न करना पड़े।
अदालत ने यह भी कहा कि आम नागरिक तब तक कोई शिकायत नहीं करते जब तक कि समस्या असहनीय न हो जाए, और इस प्रकार पुलिस को सक्रिय रूप से ऐसे मामलों में कार्रवाई करनी चाहिए। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि आवासीय क्षेत्रों में दिन के समय परिवेशी ध्वनि का स्तर 55 डेसिबल से अधिक नहीं होना चाहिए, जबकि रात के समय यह 45 डेसिबल से अधिक नहीं होना चाहिए।
इसके अलावा, अदालत ने मुंबई के पुलिस आयुक्त को निर्देश दिया कि वह सभी पुलिस थानों को यह निर्देश जारी करें कि यदि किसी धार्मिक स्थल पर लाउडस्पीकर से संबंधित कोई भी शिकायत प्राप्त होती है, तो उसे तुरंत हल किया जाए।
इस फैसले में अदालत ने यह भी बताया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह जरूरी है कि किसी भी व्यक्ति, समूह या संस्था को यह अधिकार नहीं होना चाहिए कि वह सार्वजनिक शांति और सुरक्षा के नियमों का उल्लंघन करें, और कानून लागू करने वाले अधिकारी इसके प्रति लापरवाह बने रहें। अदालत ने यह भी कहा कि सार्वजनिक स्थलों पर शोर और ध्वनि प्रदूषण का सामना कर रहे नागरिकों को अपनी शिकायतें दर्ज कराने में किसी प्रकार की कठिनाई या डर नहीं होना चाहिए, ताकि उन्हें उचित न्याय मिल सके।
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