सिब्बल ने बताया कि 13 दिसंबर 2024 को विपक्ष के 55 सांसदों ने जस्टिस शेखर यादव के खिलाफ राज्यसभा सभापति को महाभियोग का नोटिस सौंपा था। उन्होंने सवाल किया कि इतने समय बाद भी न तो नोटिस स्वीकार किया गया और न ही हस्ताक्षर सत्यापन की प्रक्रिया पूरी हुई। कपिल सिब्बल ने कहा, “क्या सिर्फ साइन वैरिफाई करने में छह महीने लगते हैं?” उन्होंने दावा किया कि सरकार जस्टिस यादव को बचाने का प्रयास कर रही है, क्योंकि उन्होंने कथित रूप से विश्व हिंदू परिषद (VHP) के एक कार्यक्रम में सांप्रदायिक बयान दिया था, जिसकी जांच सुप्रीम कोर्ट द्वारा भी की जा रही है।
सिब्बल ने जस्टिस यशवंत वर्मा के मामले का हवाला देते हुए कहा कि उनके खिलाफ इन-हाउस जांच की रिपोर्ट के बाद सरकार महाभियोग लाने की योजना बना रही है। इसके विपरीत, जस्टिस शेखर यादव के मामले में राज्यसभा सचिवालय ने सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखकर इन-हाउस जांच रोकने की मांग की थी।
सिब्बल सिब्बल ने कहा, “अगर यादव के खिलाफ इन-हाउस जांच रोकी जा सकती है, तो वर्मा के मामले में ऐसा क्यों नहीं किया गया?” यह भी आरोप लगाया कि कानून मंत्री किरेन रिजिजू वकीलों से सलाह लेकर जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहे हैं, जो उन्हें पूरी तरह असंवैधानिक प्रतीत होता है।
कपिल सिब्बल ने यह स्पष्ट किया कि यदि सरकार जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाती है, तो वे उसका विरोध करेंगे। उन्होंने चेताया कि सिर्फ इन-हाउस रिपोर्ट के आधार पर किसी न्यायाधीश को पद से हटाना संविधान सम्मत नहीं है। यह न्यायिक स्वतंत्रता को नियंत्रित करने की कोशिश है, जो बेहद खतरनाक संकेत है। सिब्बल ने दावा किया कि जस्टिस शेखर यादव ने VHP के मंच से अल्पसंख्यकों के खिलाफ कथित रूप से भड़काऊ बयान दिया था, जिसे सांप्रदायिक करार दिया गया। उनके अनुसार, यह बयान न्यायिक गरिमा और संविधान दोनों का उल्लंघन था।
उन्होंने यह भी बताया कि सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर सुनवाई हुई, जस्टिस यादव से पूछताछ की गई और इलाहाबाद हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस ने इस पर नकारात्मक रिपोर्ट भी सौंपी है।





