यह पहल 2008 में ऐतिहासिक भारत-अमेरिका नागरिक परमाणु समझौते के बाद की सबसे बड़ी परमाणु ऊर्जा साझेदारी मानी जा रही है। हालांकि, उस समय परमाणु वार्ता में अपेक्षित प्रगति नहीं हो सकी थी, लेकिन अब इसे पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जा रहा है। भारत की ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए, पीएम मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप ने परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में अपने विश्वास को दोहराया है।
अमेरिका द्वारा डिजाइन किए गए परमाणु रिएक्टर होंगे स्थापित
व्हाइट हाउस में हुई इस बैठक के बाद दोनों देशों ने अपने संयुक्त बयान में कहा कि वे "बड़े पैमाने पर स्थानीयकरण और संभावित प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के माध्यम से" भारत में अमेरिकी डिज़ाइन वाले परमाणु रिएक्टरों की स्थापना पर मिलकर काम करेंगे। खास बात यह है कि 21वीं सदी में अब तक किसी भी अमेरिकी परमाणु रिएक्टर को भारतीय धरती पर स्थापित नहीं किया गया था, लेकिन अब इस गतिरोध को समाप्त करने की कोशिश की जा रही है।
दोनों देशों के नेताओं ने न केवल बड़े परमाणु रिएक्टरों के निर्माण में रुचि दिखाई है, बल्कि भारत में उन्नत छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों (Small Modular Reactors - SMRs) की स्थापना पर भी सहमति बनी है। ये उन्नत तकनीक वाले छोटे रिएक्टर भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
पीएम मोदी के कूटनीतिक कौशल के कायल हुए ट्रंप
करीब एक घंटे तक चली इस द्विपक्षीय वार्ता के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी के बातचीत कौशल की खुलकर तारीफ की। एक प्रेस ब्रीफिंग के दौरान, जब एक पत्रकार ने उनसे पूछा कि कौन अधिक कठिन वार्ताकार (Tough Negotiator) है, तो ट्रंप ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया:
"वह (पीएम मोदी) मुझसे कहीं अधिक कठिन और कुशल वार्ताकार हैं। यहां कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है।"
इस बैठक में व्यापार संबंधों पर भी चर्चा हुई, और दोनों देशों ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 500 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक बढ़ाने का संकल्प लिया। इसके तहत व्यापार शुल्कों को कम करने और बाज़ार तक पहुंच को आसान बनाने के लिए एक द्विपक्षीय व्यापार समझौते की रूपरेखा तैयार की जाएगी।
भारत और अमेरिका के बीच यह परमाणु सहयोग भारत की ऊर्जा सुरक्षा, स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों और औद्योगिक विकास को मजबूत करेगा। अमेरिकी डिज़ाइन वाले परमाणु रिएक्टरों की स्थापना से भारत की बिजली उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी, जिससे देश के विभिन्न क्षेत्रों में ऊर्जा आपूर्ति सुगम होगी।
भारत की यह पहल सिर्फ ऊर्जा उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक रणनीतिक सहयोग और तकनीकी साझेदारी का एक नया अध्याय भी खोल सकती है। दोनों देशों के बीच इस ऐतिहासिक परमाणु समझौते के सफल कार्यान्वयन से न केवल भारत की ऊर्जा जरूरतें पूरी होंगी, बल्कि अमेरिका के साथ उसके रणनीतिक और व्यापारिक संबंध भी और मजबूत होंगे।
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