कोर्ट 29 अगस्त को सीएक्यूएम की बुलाई गई बैठक को लेकर काफ़ी नाराज़ दिखा। कोर्ट ने कहा कि बैठक में 11 सदस्यों में से केवल पाँच ही बैठक के लिए पहुंचे। जहाँ कोर्ट के निर्देशों को लेकर कोई चर्चा भी नहीं की गई। कोर्ट ने कहा कि जब तक लोग यह नहीं समझेंगे कि पराली या प्रदूषण फ़ैलाने जैसी गतिविधि करने पर उन्हें सीएक्यूएम की कड़ी कार्रवाई का सामना करना पडेगा, तब तक वह प्रदुषण फ़ैलाने जैसी गतिविधियों को करने से नहीं रुकेंगे। कोर्ट ने कहा कि दोनों राज्य की सरकारों और सीएक्यूएम की गतिविधि से साफ़ पता चल रहा है कि वह समस्या को लेकर गंभीर नहीं है। जस्टिस अभय इस ओका और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की पीठ ने यह टिप्पणी सीएक्यूएम की स्थिति रिपोर्ट की समीक्षा के आधार पर कही। रिपोर्ट के अनुसार, 15 से 30 सितंबर के बीच हरियाणा और पंजाब में 129 पराली जलाने की अवैध घटनाएँ हुई।
सुप्रीम कोर्ट ने माँगी थी जानकारी
सुप्रीम कोर्ट ने पिछले हफ्ते आयोग और उसकी विभिन्न उप-समितियों से प्रदूषण की समस्या को सुलझाने के लिए वर्षों से उठाए गए कदमों के बारे में जानकारी मांगी थी, क्योंकि सर्दियों के महीनों में पराली जलाने से दिल्ली की वायु गुणवत्ता बेहद खराब हो जाती है। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि आयोग केवल राज्य सरकारों के साथ बैठक आयोजित करने में व्यस्त है और आदेशों को लागू करने के लिए प्रयास नहीं कर रहा है। कोर्ट ने आयोग की शक्तियों को स्पष्ट करते हुए कहा कि उसे अधिनियम की धारा 14 और 15 के तहत अपराधियों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज करने, जुर्माना लगाने और प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों को बंद करने का अधिकार है। कोर्ट ने कहा कि ऐसा लग रहा है कि आयोग किसी न किसी कारण किसी के खिलाफ मामला दर्ज नहीं करना चाहता। आयोग को हिदायत देते हुए कोर्ट ने कहा कि उसे नियमों को लागू करवाने के लिए काम करना चाहिए। केवल बैठकें बुलाने से कुछ नहीं होगा, कार्रवाई जरूरी है।





