भ्रामक विज्ञापन मामले में बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण पर अवमानना की कार्रवाई होगी। सुप्रीम कोर्ट ने आज उनके माफ़ीनामे को अस्वीकार करते हुए बेहद तीखी टिप्पणियाँ कीं। अदालत ने कहा कि वह अंधी नहीं है, उसे सब दिखायी पड़ता है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी के बावजूद पतंजलि की ओर से दवाओं के संबंध में भ्रामक विज्ञापन दिये गये थे और एलोपैथी के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार किया गया था।
बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए बाबा रामदेव को कड़ी फटकार लगायी जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा कि 'आप हलफनामे में धोखाधड़ी कर रहे हैं, इसको किसने तैयार किया है? मुझे तो आश्चर्य है।' वहीं जस्टि हिमा कोहली ने कहा कि वैसे भी हम इस पर फैसला करेंगे, हम इसको जानबूझकर कोर्ट के आदेश की अवहेलना मान रहे हैं। इस हलफनामे को ठुकराते हैं, ये सिर्फ एक कागज का टुकड़ा है। हम अंधे नहीं हैं, हमें सब दिखता है।
कोर्ट के सख़्त रुख को देखते हुए जब सोलिसिटर जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा कि लोगों से गलतियां हो जाती हैं तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गलती होती है तो सजा भी मिलती है। उन्हें भुगतना भी पड़ता है। उन्हें तकलीफ भी उठानी पड़ती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ड्रग्स लाइसेंसिंग अधिकारियों को अभी सस्पेंड किया जाये। ये लोग दबदबा बनाते हैं और इसे स्वीकार भी कर लिया जाता है। अदालत का मखौल बनाया जा रहा है। इनका कहना है कि विज्ञापन का उद्देश्य लोगों को आयुर्वेदिक दवाओं से जोड़े रखना है। मानो ये दुनिया में आयुर्वेदिक दवाएं लाने वाले पहले शख्स हों।
ड्रग्स विभाग के ज्वाइंट डायरेक्टर मिथिलेश कुमार को फटकार लगाते हुए कोर्ट ने कहा कि आपको शर्म आनी चाहिए, क्यों न आपके खिलाफ कार्रवाई हो. लोग मर जाएं आप बस वार्निंग देते रहे। आपने बहुत नौकरी कर कर ली. अब घर पर बैठिए। अभी बुद्धि नहीं आई है।
जस्टिस हिमा कोहली ने कहा कि आप चाहते हैं कि हम एक आदमी को माफ कर दें। उन सभी लोगों का क्या जिन्होंने आपकी दवा खाई थी। उनके बारे में क्या जिनके बारे में कहा गया था कि ये बीमारी दूर कर देंगी, जबकि इनका इलाज ही नहीं हो सकता था।
21 नवंबर को क्या कहा गया था
21 नवंबर 2023 को पतंजलि की तरफ़ से पेश हुए वकील ने पतंजलि के भ्रामक विज्ञापनों को लेकर सुप्रीम कोर्ट को यह भरोसा दिया था कि आगे से कंपनी की तरफ़ से कोई भ्रामक विज्ञापन नहीं दिया जायेगा।इसके अलावा किसी भी क़ानूनी नियमों का उल्लंघन नहीं किया जायेगा। लेकिन उसके बाद भी पतंजलि की तरफ़ से भ्रामक विज्ञापनों को नहीं रोका गया। जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपना सख़्त रुख अपनाया था।
अदालत पतंजलि पर किस मामले को लेकर सुनवाई कर रहा है?
अदालत यहां पर दो मामलों को लेकर सुनवाई कर रहा है। पहला मामला वह है जिसमें पतंजलि ने एलोपैथी पर हमला करते हुए पतंजलि के उत्पादों द्वारा कुछ बीमारियों को ठीक करने का दावा किया था। इसमें कोविड-19 का इलाज़ भी शामिल है। जिसके बाद नाराज़ इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने बाबा रामदेव और पतंजलि के ख़िलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी। इसमें कहा गया था कि पतंजलि भ्रामक विज्ञापनों की आड़ में एलोपैथी के इलाज़ पर सवाल खड़े कर रहे हैं।
दूसरा मामला 21 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना को लेकर है। 21 नवंबर के आदेश के बाद भी जब भ्रामक विज्ञापन पतंजलि ने नहीं रोके, तब 27 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने बाबा रामदेव और बालकृष्ण को अवमानना का नोटिस जारी किया था। जिसके बाद ही भ्रामक विज्ञापनों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक भी दिया गया था।
रामदेव और बालकृष्ण ने नहीं दिया था नोटिस का जवाब
सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के अनुसार, बाबा रामदेव और बालकृष्ण को मार्च में सुप्रीम कोर्ट के नोटिस का जवाब देना था, लेकिन उन्होंने नहीं दिया। कुछ ख़बरों के अनुसार बाद में बालकृष्ण ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफ़नामा भी दायर किया था जिसमें उनका कहना था कि विवादित विज्ञापनों में केवल सामान्य बयान थे, ग़लती से कुछ आपत्तिजनक वाक्य भी शामिल हो गए थे। हलफनामें में बालकृष्ण ने कहा था कि ड्रग एंड मैजिक रेमेडीज एक्ट में नियम बहुत पुराने हैं जिसमें आयुर्वेद को शामिल नहीं किया गया था।
आपको अदालत को दिए गए वचनों का पालन करना होगा - सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने पिछली सुनवाई में रामदेव और बालकृष्ण को फट्कार लगाते हुए बोला था, ‘आपको अदालतों को दिए वचनों का पालन करना होगा, आपने हर सीमा को तोड़ दिया है। यह पूरी तरह से कोर्ट की अवमानना है।'
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की भी लगाई थी क्लास
अपनी पिछली सुनवाई में अदालत ने केंद्र सरकार से पूछा था कि जब पतंजलि भ्रामक विज्ञापन कर रहा था तब आयुष मंत्रालय ने कोई कार्रवाई क्यों नहीं की? कोर्ट ने अपने आदेश में पतंजलि को माफ़ीनामा दाखिल करने का आखिरी मौक़ा दिया था।





