मुख्यमंत्री सरमा ने दावा किया कि 1980 के दशक में भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ (RAW) को यह पुख्ता जानकारी मिली थी कि पाकिस्तान का काहूटा प्लांट यूरेनियम संवर्धन का केंद्र बन चुका है। उन्होंने लिखा,
"भारतीय सेना ने उस समय केंद्र सरकार को इस खतरे के खिलाफ प्रीएम्प्टिव स्ट्राइक के लिए पूरा समर्थन दिया था। इजरायल ने भी खुफिया सहयोग और संयुक्त हवाई हमले की पेशकश की थी। जामनगर एयरबेस को लॉन्चपैड के रूप में चिह्नित किया गया था।"
सरमा के मुताबिक, भारत के पास उस समय इस खतरे को समाप्त करने की क्षमता और रणनीतिक समर्थन मौजूद था, लेकिन अंत में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया के डर से ऑपरेशन को रद्द कर दिया। बाद में राजीव गांधी ने भी योजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया और वैश्विक दबाव के चलते कूटनीतिक रास्ता चुना।
हिमंत बिस्वा सरमा ने आगे कहा कि 1988 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी और पाकिस्तान की तत्कालीन प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो ने परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमला न करने का समझौता किया। लेकिन 1998 में पाकिस्तान ने अचानक परमाणु परीक्षण कर पूरी दुनिया को चौंका दिया। सरमा ने लिखा, "इस परीक्षण ने भारत को भी परमाणु हथियारों की महंगी दौड़ में धकेल दिया। कारगिल युद्ध, सीमापार आतंकवाद और लगातार होने वाले हमले इसी परमाणु सुरक्षा कवच के साए में होते रहे।
सीएम सरमा ने 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान INDIA गठबंधन पर भी निशाना साधते हुए कहा,
"हैरानी की बात यह है कि इस गठबंधन की एक घटक पार्टी, सीपीआई (एम) ने अपने घोषणापत्र में भारत की परमाणु नीति को समाप्त करने की बात कही है।" पोस्ट के अंत में मुख्यमंत्री ने तीखा हमला करते हुए कहा,
"जहां मजबूत नेतृत्व दूरदर्शिता और साहस की मांग करता है, वहां कांग्रेस ने संकोच और देरी दिखाई। कुछ दिनों की अंतरराष्ट्रीय सहमति के लिए भारत ने वह ऐतिहासिक अवसर गंवा दिया, जिससे हमारी दीर्घकालिक सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती थी। आज तक भारत और पूरा क्षेत्र उसकी रणनीतिक कीमत चुका रहा है।"





