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"भारतीय ज्ञान की ताकत उसके आपसी जुड़ाव में है": उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़

उपराष्ट्रपति ने भारतीय संस्कृति और ज्ञान की समृद्धि पर जोर देते हुए कहा, "कई चेतावनियाँ हो सकती हैं, लेकिन मैं उन्हें आशीर्वाद के रूप में लेता हूँ।

"भारतीय ज्ञान की ताकत उसके आपसी जुड़ाव में है": उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़
फोटो: Vice President, Jagdeep Dhankhar
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने नई दिल्ली में भारतीय विद्या भवन में नंदलाल नवल इंडोलॉजी सेंटर के शिलान्यास समारोह को संबोधित किया। अपने भाषण में उपराष्ट्रपति ने भारतीय संस्कृति और ज्ञान की समृद्धि पर जोर देते हुए कहा, "कई चेतावनियाँ हो सकती हैं, लेकिन मैं उन्हें आशीर्वाद के रूप में लेता हूँ। ये चेतावनियाँ मुझे प्रेरित करेंगी और मेरे प्रयासों को राष्ट्र और इसकी संस्कृति के प्रति समर्पित रखेंगी।" उन्होंने कहा कि भारत की महानता उसकी परस्पर संबद्धता में निहित है। "हम कभी भी अलग-थलग देश नहीं रहे हैं। हमारी परंपरा पूरे विश्व को एक परिवार के रूप में देखने की है।"

भारतीय विद्या भवन और डॉ. के. एम. मुंशी को श्रद्धांजलि


उपराष्ट्रपति ने भारतीय विद्या भवन और इसके संस्थापक डॉ. के. एम. मुंशी के योगदान की सराहना करते हुए कहा, "यह मेरे लिए अत्यंत सम्मान की बात है कि मैं भारतीय विद्या भवन से जुड़ी इस संस्था की आधारशिला रखने का भागीदार बन रहा हूँ। नंदलाल नवल इंडोलॉजी सेंटर भारत के प्राचीन ज्ञान और सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने में एक मील का पत्थर साबित होगा।" उन्होंने 1938 की कठिन परिस्थितियों का जिक्र करते हुए कहा, "उस समय, जब विदेशी शिक्षा और पश्चिमी विचारधारा को बुद्धिमत्ता और प्रगति का पर्याय माना जाता था, डॉ. मुंशी ने भारतीय संस्कृति और ज्ञान प्रणालियों को संरक्षित करने का संकल्प लिया। सोमनाथ मंदिर इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है।"

भारतीय परंपराओं और आधुनिकता का अनोखा संगम


धनखड़ ने इस बात पर जोर दिया कि डॉ. मुंशी ने भारतीय परंपराओं को आधुनिकता के साथ जोड़ा और विरासत की रक्षा की, जबकि अधिकांश लोग पश्चिमी विचारधाराओं का समर्थन कर रहे थे। उन्होंने कहा, "सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण में डॉ. मुंशी की भूमिका भारत की सांस्कृतिक पुनरुत्थान की यात्रा का प्रतीक है। उनके विचार और कार्य भारतीय प्रधानमंत्री और तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को भी प्रभावित कर चुके थे।"

इंडोलॉजी और भारतीय विरासत


उपराष्ट्रपति ने भारतीय विद्या भवन के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा, "शास्त्रीय भाषाओं को बढ़ावा देने, प्राचीन ग्रंथों को प्रकाशित करने और भारत की विरासत में एकता की भावना को सुदृढ़ करने में इस संस्था ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।" उन्होंने इस बात पर बल दिया कि इंडोलॉजी के सिद्धांत भारत के विकास के लक्ष्य तक पहुँचने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। धनखड़ ने कहा, "हमें 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए इंडोलॉजी के उत्कृष्ट सिद्धांतों को अपनाने और उन्हें जीवन का हिस्सा बनाने के लिए जोश, जुनून और समर्पण के साथ काम करना होगा।"