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रूपी सोरेन के निधन से झामुमो परिवार में शोक की लहर

झारखंड में शोक की लहर, राजनीतिक योगदान को याद किया जा रहा है।

रूपी सोरेन के निधन से झामुमो परिवार में शोक की लहर
फोटो: Rupi Soren's Death Leaves JMM Family in Mourning

रूपी सोरेन का निधन

झामुमो के संस्थापक शिबू सोरेन की पत्नी और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मां, रूपी सोरेन का बुधवार रात को एक अस्पताल में निधन हो गया। उनके निधन से पूरे राज्य में शोक की लहर दौड़ गई। शिबू सोरेन के सामाजिक अभियानों के बीच, रूपी सोरेन ने परिवार और बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी संभाली।


रूपी सोरेन ने शिबू सोरेन के कठिन समय में पार्टी को संभालते हुए कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाया। 1999 में, उन्होंने दुमका लोकसभा सीट से चुनाव भी लड़ा, जिससे झामुमो परिवार का एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त हो गया है।


समाज और परिवार के प्रति समर्पण

जानकार बताते हैं कि दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने 1962 में रूपी किस्कू से विवाह किया, जब वे महज 18 साल के थे। इस समय, रूपी सोरेन की उम्र भी अधिक थी। अपने पिता की हत्या से प्रभावित होकर, शिबू सोरेन ने समाज को महाजनी प्रथा से मुक्त कराने के लिए संघर्ष शुरू किया। विवाह के बाद, रूपी सोरेन ने संयुक्त परिवार में गृहस्थी की जिम्मेदारी संभाली।


वे अक्सर अपने पति के आंदोलन के कारण घर से दूर रहते थे, जिसके चलते रूपी सोरेन ने अपनी बड़ी पुत्री अंजली और तीन पुत्रों दुर्गा, हेमंत और बसंत की परवरिश की। उन्होंने बच्चों में हक और अधिकार के लिए संघर्ष करने का संस्कार भी विकसित किया।


राजनीतिक संघर्षों में भागीदारी

रूपी सोरेन ने 1996 के बाद अपने पति के कानूनी संकट के दौरान पार्टी का नेतृत्व किया। 1999 में, उन्होंने दुमका लोकसभा सीट पर भाजपा के बाबूलाल मरांडी के खिलाफ चुनाव लड़ा और केवल 4,648 मतों के अंतर से हार गईं। इस चुनाव में रूपी सोरेन ने भाजपा के कद्दावर नेता को कड़ी टक्कर दी।


उनके बड़े पुत्र स्वर्गीय दुर्गा सोरेन दुमका के जामा से दो बार विधायक रहे। हेमंत सोरेन और बसंत सोरेन भी लगातार विधायक चुने जाते रहे हैं। वहीं, उनकी बड़ी बेटी अंजनी सोरेन भी राजनीति में सक्रिय हैं।


परिवार और पार्टी के प्रति योगदान

रूपी सोरेन के निधन से झारखंड के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त हो गया है। भले ही वे राजनीति में सक्रिय नहीं रहीं, लेकिन उन्होंने हमेशा परिवार और पार्टी के कार्यकर्ताओं को स्नेह और समर्थन दिया। उनके योगदान को हमेशा याद किया जाएगा।


उनकी बहू सीता सोरेन ने तीन बार जामा से विधायक का चुनाव जीतकर पार्टी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जबकि उनके अन्य पुत्रों की राजनीतिक पृष्ठभूमि भी उनके संघर्षों का प्रमाण है।