खेड़ा के अनुसार, विदेश नीति के मोर्चे पर भारत को एक के बाद एक झटके झेलने पड़े हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि पाकिस्तान को न केवल चीन, रूस, ईरान, तुर्की और मलेशिया का समर्थन मिला है, बल्कि संयुक्त राष्ट्र में चीन ने हमलावरों के नाम उजागर करने से भी रोक दिया। उन्होंने यह भी दावा किया कि भारत के कालापानी क्षेत्र पर नेपाल ने दोबारा दावा जताते हुए नया नक्शा जारी किया, जबकि कश्मीर को लेकर इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) और पश्चिम एशियाई देशों ने भारत पर लगातार निशाना साधा है।
खेड़ा ने आगे कहा कि सऊदी अरब द्वारा भारत समेत 14 देशों के लिए वीज़ा निलंबित करना विदेश नीति को लगे ताजा झटकों में से एक है। इसके अलावा, कनाडा के साथ खालिस्तान विवाद के चलते G7 जैसे मंच पर भारत को दरकिनार किया गया, जबकि G20 सम्मेलन में कोई ठोस प्रगति नहीं हो सकी। उन्होंने मालदीव और श्रीलंका के चीन की ओर झुकाव, बीजिंग को दी गई रणनीतिक परिसंपत्तियों की लीज, नेपाल द्वारा क्षेत्रीय दावे और रूस-पाकिस्तान के बीच सैन्य-ऊर्जा समझौतों को भी भारत के लिए चिंता का विषय बताया। खेड़ा के मुताबिक, BRICS और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) अब चीन के मुखपत्र बन चुके हैं।
अपने पोस्ट में उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि आर्थिक संकट के बावजूद पाकिस्तान ने विश्व बैंक, आईएमएफ और एशियाई विकास बैंक से अरबों डॉलर की सहायता हासिल की और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर मुद्दे को जोरशोर से उठाया। उन्होंने कहा कि तुर्की ने पाकिस्तान के समर्थन में युद्धपोत भेजा, ईरान ने मध्यस्थता की पेशकश की और कतर, कुवैत तथा मलेशिया ने इस्लामाबाद के रुख का समर्थन किया। खेड़ा ने निशाना साधते हुए कहा, "इस सरकार की तथाकथित ताकतवर विदेश नीति अब उसके पीआर तंत्र के बोझ तले ही दम तोड़ चुकी है। भारत देश के भीतर जितना मुखर है, वैश्विक मंचों पर उतना ही अकेला दिखाई देता है।"





