Molitics Logo
होम राष्ट्रीय दसवीं बार नीतीश कुमार की सरकार, पर सवाल वही - क्या पलायन और बेरोज़गारी को मिलेगी राहत?
राष्ट्रीय

दसवीं बार नीतीश कुमार की सरकार, पर सवाल वही - क्या पलायन और बेरोज़गारी को मिलेगी राहत?

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों के बाद इस बार लोगों ने नीतीश कुमार पर दसवीं बार भरोसा जताया है। उम्मीद है कि आने वाले पाँच सालों में खासकर पलायन और रोजगार |

दसवीं बार नीतीश कुमार की सरकार, पर सवाल वही - क्या पलायन और बेरोज़गारी को मिलेगी राहत?
फोटो: Nitish Kumar 10th term, Bihar Assembly Election 2025
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजे घोषित हो चुके हैं, शपथ ग्रहण समारोह भी हो गया है। नीतीश कुमार ने इतिहास रचते हुए दसवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और राज्य में एक बार फिर एनडीए की सरकार बन गई। आरोप–प्रत्यारोप, कसीदे–वादे, सब धीरे-धीरे धुंध की तरह छँट गए हैं। कहा जा रहा है कि इस बार महिलाओं ने जीत में अहम भूमिका निभाई, लेकिन सवाल यह है कि चुनाव से ठीक पहले उन्हें दिए गए 10,000 रुपये क्या बिहार का पलायन रोक पाएंगे? क्या यही दस हज़ार अगले पाँच साल तक पेट की भूख मिटा देंगे?

बिहार में राजनीतिक उठापटक होते रहे, पर दो दशकों से कुर्सी पर नीतीश कुमार ही हैं। इसके बावजूद बेरोज़गारी, पलायन, कमजोर उद्योग, चरमराती शिक्षा–स्वास्थ्य व्यवस्था और बिगड़ता जनसांख्यिकीय संतुलन जैसे मूल मुद्दे जस के तस हैं। हर चुनाव के बाद वोटर खुद को ठगा महसूस करता है—सत्ता बदलती है, समस्याएँ नहीं। कभी “एक बिहारी सौ पर भारी” कहा जाता था, लेकिन हालात ऐसे बने कि यह पंक्ति अब तंज की तरह लगने लगी—“एक बिहारी सौ बीमारी।”

आज भी बिहार की सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि उसकी युवाशक्ति और मेहनतकश आबादी गांवों के बजाय ट्रेनों, शहरों और निर्माण स्थलों पर दिखती है। गांव खाली हो रहे हैं, खेत सूने हैं, पर स्टेशन और बस अड्डे भरे रहते हैं। यह लेख इसी प्रवासन इतिहास, वर्तमान स्थिति, सरकारी उम्मीदों और आगे की राह का विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

बिहार से मजदूरों का पलायन—एक इतिहास, जो आज तक नहीं बदला


बिहार का पलायन 18वीं–19वीं शताब्दी में शुरू हुआ, जब मुग़ल और ईस्ट इंडिया कंपनी लोगों को मजदूर और सैनिक बनाकर बाहर ले गई। आज़ादी के बाद पंजाब–हरियाणा की हरित क्रांति और बिहार की औद्योगिक गिरावट ने इसे बढ़ाया। 1990 के बाद महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत के उद्योगों ने प्रवास और तेज किया। आज छात्र, युवा और मजदूर पढ़ाई–नौकरी–रोज़गार के लिए बिहार छोड़ते हैं, और त्योहारों में भी गांव पहले जैसे नहीं भरते।

चुनाव हो गए, सरकार बन गई—पर सवाल अब भी वही क्यों खड़े हैं?


सरकार सड़क, पुल, बिजली और निवेश की बात करती है, लेकिन जनता पूछती है—रोजगार कहाँ है? उद्योग क्यों नहीं लग रहे? अस्पतालों में दवा क्यों नहीं मिलती? एंबुलेंस समय पर क्यों नहीं पहुँचती? सोशल मीडिया के दौर में सच्चाई छिपती नहीं। नया पुल बारिश में बह जाता है, गर्भवती महिला को पति कंधे पर उठाकर ले जाता है, परीक्षा और नियुक्तियों में धांधली की खबरें आती हैं। कागज पर विकास चमकीला है, ज़मीन पर धुंधला।

समकालीन बिहार—देश का यह बड़ा राज्य कहां खड़ा है?


बिहार, देश का तीसरा सबसे अधिक आबादी वाला राज्य होते हुए भी कई विकास सूचकांकों पर कमजोर है। ग्रामीण आबादी का 55% गरीबी रेखा से नीचे जी रहा है। उद्योगों की कमी, कृषि संकट, और सीमित गैर-कृषि रोजगार ने अवसर बहुत घटा दिए हैं। कमजोर सड़क-स्वास्थ्य-शिक्षा ढांचा और अपर्याप्त कौशल प्रशिक्षण स्थिति को और कठिन बनाते हैं। आशीष बोस द्वारा दिया गया ‘BIMARU’ टैग आज भी पूरी तरह नहीं मिटा, और बिहार देश का सबसे बड़ा ‘लेबर सप्लाई हब’ बन गया है।

महिलाओं का पलायन—एक अदृश्य संघर्ष की कहानी


अध्ययनों के अनुसार बिहार में 98% कामकाजी पलायन पुरुष करते हैं, जबकि महिलाओं का पलायन ज्यादातर परिवार आधारित होता है। पुरुषों के बाहर जाने पर महिलाएँ घर, बच्चे, बुजुर्ग और खेती संभालती हैं, पर बैंक, योजनाओं और स्वास्थ्य सेवाओं तक उनकी पहुंच सीमित रहती है। पितृसत्ता और गहराती है। बाहर मजदूरी करने वाली महिलाओं को ईंट भट्ठों और निर्माण स्थलों पर असुरक्षा, शोषण और कम मजदूरी का सामना करना पड़ता है।

कौन सा जिला किस तरह का पलायन करता है—बिहार की सामाजिक बनावट


IHD (Institute for Human Development) के अनुसार बिहार में पलायन आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक असमानता से जुड़ा है। पूर्णिया–अररिया के मजदूर दिहाड़ी कामों के लिए जाते हैं, जबकि नालंदा–रोहतास के लोग पढ़ाई और प्रोफेशनल नौकरियों में दिखते हैं। दिल्ली के सर्वे में 33% SC, 50% OBC और 96% भूमिहीन मिले। 80% मिडिल स्कूल से आगे नहीं पढ़े थे। यह स्पष्ट करता है कि पलायन केवल रोजगार की मजबूरी नहीं, बल्कि गहरी सामाजिक विषमता का असर है।

प्रवासी मतदाताओं का संकट—पहचान और लोकतंत्र का सवाल


बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले SIR के दौरान प्रदेश में करीब 35 लाख प्रवासी मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हट गए। कारण था—सत्यापन के समय घर पर मौजूद न मिलना। 90% प्रवासी मजदूरों को चुनाव आयोग की प्रक्रियाओं की जानकारी ही नहीं थी।दिल्ली के मिथिला विहार में रहने वाले कई प्रवासी कहते हैं—“हमने गांव छोड़ा है, पहचान नहीं… क्या हम अब बिहार के नहीं रहे?” यह समस्या सिर्फ एक दस्तावेज़ तक सीमित नहीं, बल्कि यह अधिकार और लोकतंत्र से जुड़ा गंभीर संकट है।

प्रवासी मजदूरों की वास्तविक चुनौतियाँ


प्रवासी मजदूरों की यात्रा भीड़भाड़ वाले जनरल कोच, पुलिस सख्ती, चोरी और बदसलूकी से शुरू होती है। नौकरी दलालों–ठेकेदारों के जरिए मिलती है, जहाँ वेतन और सुरक्षा का कोई लिखित भरोसा नहीं होता। शहरों में उनका रहना तंग कमरों और गंदे माहौल में होता है, जिससे बीमारी और खतरे बढ़ते हैं। जातिगत भेदभाव भी गांवों की तरह उनका पीछा नहीं छोड़ता।

बिहार में उद्योग—कहां और क्यों रुक जाता है पहिया?


राज्य में उद्योगों की भारी कमी पलायन का सबसे बड़ा कारण है। सरकार ने कुछ पहल जरूर की हैं, जैसे गया में Integrated Manufacturing City (IMC) प्रोजेक्ट के तहत 1,09,000 नौकरियों और 16,000 करोड़ के निवेश का लक्ष्य। सड़क, बिजली और संचार सुधार की दिशा में कदम भी उठाए गए हैं। लेकिन इन प्रयासों का प्रभाव बेहद धीमा है।

नीतियों में निरंतरता, प्रशासनिक पारदर्शिता और मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण बड़े निवेशक बिहार आने से हिचकते रहे हैं।

उद्यमिता—नई राह पर नई कोशिशें, पर रास्ता लंबा


बिहार Startup Policy 2017 और CMES के तहत युवाओं को 10 लाख रुपये तक बिना ब्याज ऋण और SC/ST, EBC, महिला व अल्पसंख्यक उद्यमियों को प्राथमिकता दी जाती है। योजनाएँ सही दिशा में हैं, लेकिन प्रभाव सीमित है। उद्यमिता तभी बढ़ेगी जब युवाओं को बाजार, प्रशिक्षण, मार्गदर्शन, पूंजी और स्थिर नीतियों का मजबूत समर्थन मिले।

आगे की राह - बिहार के लिए निर्णायक कदम


बिहार को पलायन से निकालने के लिए रोजगार आधारित अर्थव्यवस्था जरूरी है। टेक्सटाइल, सिल्क, हैंडलूम, फूड प्रोसेसिंग, कोल्ड स्टोरेज, डेयरी और आईटी जैसे क्षेत्रों में उद्योग बढ़ाने होंगे। कृषि सुधार, मनरेगा और ग्रामीण उद्यमिता आय बढ़ाएँगे। महिलाओं की शिक्षा–सुरक्षा और अल्पसंख्यकों की समान भागीदारी भी टिकाऊ विकास के लिए अहम है।

निष्कर्ष - बिहार की जंग जारी, उम्मीदें अब भी मज़बूत हैं


बिहार का पलायन सिर्फ आंकड़ों की नहीं, लाखों सपनों और संघर्षों की कहानी है। इससे परिवारों को पैसा और अनुभव मिला, पर इसी प्रक्रिया ने गांवों को बूढ़ा किया, घरों को खाली छोड़ा और राज्य की अर्थव्यवस्था को कमजोर कर दिया।

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों के बाद इस बार लोगों ने नीतीश कुमार पर दसवीं बार भरोसा जताया है। उम्मीद है कि आने वाले पाँच सालों में खासकर पलायन और रोजगार की स्थिति में ठोस बदलाव दिखेगा। जनता चाहती है कि अगली बार चुनाव से पहले खातों में पैसे भेजने की ज़रूरत ही न पड़े, बल्कि काम खुद बोले। बड़ा सवाल यही है—क्या अब बिहार ऐसा बन सकेगा जहाँ लोगों को रोजगार अपने ही शहर–गाँव में मिले, और शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क–बिजली और स्थानीय उद्योग वादों नहीं, बल्कि जमीन की हकीकत बनें?

अगर यह बदलाव सच में आया, तो पलायन मजबूरी नहीं, एक विकल्प बन जाएगा। तब बिहार का युवा रोटी की तलाश में नहीं, बल्कि अपने सपनों और हुनर के साथ आगे बढ़ेगा। असली लड़ाई यही है—लोगों को अपनी जमीन और पहचान छोड़ने की मजबूरी खत्म हो, और वे गर्व से कह सकें कि विकास अब यहीं, उनके अपने बिहार में हो रहा है।

Read This Also:- कर्नाटक के सीएम पद की अटकलों के बाद डीके शिवकुमार का बयान "सभी 140 विधायक मेरे हैं"